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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ४१७ द्वारपाल द्वारा सूचना पाकर अन्दर आये हुए उनसे राजा महावराह ने अनंगरति के सामने ही पूछा—॥१९७॥ 'तुम्हारा नाम क्या है, जाति क्या है और कौन-सा विशेष विज्ञान तुमलोग जानते हो ?' राजा के प्रश्नों को सुनकर उनमें से एक ने कहा—॥१९८॥ 'मैं पंचपट्टिक नाम का शूद्र (जुलाहा) हूँ। बुनने का विज्ञान जानता हूँ और प्रतिदिन पाँच जोड़े कपड़े बुनता हूँ ॥१९९॥ उन पाँच जोड़ों में से एक ब्राह्मण को देता हूँ, दूसरा जोड़ा ईश्वर को अर्पण करता हूँ, तीसरा स्वयं पहनता हूँ और चौथा जोड़ा यदि मेरी पत्नी हो तो उसे दूँ और पाँचवें जोड़े को बेचकर जीवन-निर्वाह करता हूँ ॥१ १ ॥ तब दूसरा बोला—'मैं भाषाविज्ञानी वैश्य हूँ। सभी मृगों और पक्षियों की बोलियों को जानता हूँ' ॥१ २॥ तब तीसरा बोला—'मैं खड्गधर नाम का क्षत्रिय हूँ और खड्ग के अतिरिक्त मैं अन्य किसी वृत्ति से जीवन-निर्वाह नहीं करता' ॥१ ३॥ तदनन्तर चौथा बोला—'मैं जीवदत्त नाम का ब्राह्मण हूँ। पार्वती की कृपा और विद्या के प्रभाव से मरी हुई स्त्री को जिला लेता हूँ' ॥१ ४॥ ऐसा कहते हुए शूद्र, क्षत्रिय और वैश्य तीनों ने अपने रूप, शौर्य और बल की अलग- अलग प्रशंसा की किन्तु ब्राह्मण ने रूप को छोड़ केवल बल-मात्र की बात कही। यह सुनकर राजा महावराह ने अपने द्वास्थ (प्रतीहार) से कहा कि 'तुम इन सब को अपने घर ले जाकर विश्राम कराओ'। यह सुनकर 'जो आज्ञा' कहकर द्वास्थ उन्हें अपने घर ले गया ॥१ ५—१ ७॥ उनके चले जाने पर राजा ने अपनी कन्या अनंगरति से कहा 'कहो इन चारों वीरों में से तुम किसे चाहती हो ?' ॥१ ८॥ यह सुनकर वह अनंगरति पिता से बोली—'पिता इन चारों में से एक भी मुझे पसन्द नहीं है ॥१ ९॥ इनमें एक शूद्र और जुलाहा है, इस गुण से क्या लाभ ? दूसरा वैश्य पशुओं की बोलियाँ जानता है, उसके जानने से भी क्या लाभ ? मैं क्षत्रिया होकर अपने को वैश्य और शूद्र को कैसे दे दूँ ? तीसरा मेरी समान जाति का क्षत्रिय गुणी तो है, किन्तु वह सेवा से जीवन व्यतीत करनेवाला दरिद्र और प्राणों को बेचनेवाला है। मैं पृथ्वीपति की कन्या होकर उस नौकर की पत्नी कैसे बनूँ ॥११०-११२॥ ५३