कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम लम्बक ५१५ इसके प्रभाव से ही भूत भविष्य और वर्तमान को मैं जानती हूँ। वही उस अनंगप्रभा को राजा हरिवर ले गया ॥२५०॥ तेरे सोये रहने पर वह राजा हरिवर उसके गान से आकृष्ट होकर उसी मार्ग से आ गया था किन्तु वह दुराचारिणी उसे भी छोड़कर फिर दूसरे के पास चली जायगी ॥२५१ २५२॥ उस खड्ग को देवी ने तुझे उसी की प्राप्ति के लिए दिया था। उसके हरण हो जाने पर वह दिव्य खड्ग फिर देवी के पास ही चला गया ॥२५३॥ और, देवी ने ही अनंगप्रभा के शाप का वर्णन करते हुए स्वप्न में तुझे जो उसका भविष्य बतलाया था वह तू क्यों भूल गया ? ॥२५४॥ तो इस असत्यंवादी बात में तुझे यह मिथ्या मोह क्यों हो रहा है ? तू बार-बार अति दुःख देनेवाले इस पाप के बन्धन को तोड़ दे ॥२५५॥ आर्त, दूसरे पुरुष से प्रेम करनेवाली और मनुष्य बनी हुई तथा तुम्हारे साथ धोखा करने के कारण भ्रष्ट विद्यावाली उस पापिन को पाकर भी तुम क्या करोगे ? ॥२५६॥ उस पतिव्रता द्वारा इस प्रकार समझाये गये जीवदत्त ने अनंगप्रभा की आशा छोड़ दी और उसकी चंचलता से विरक्त होकर वह प्रियव्रता से बोला—॥२५७॥ 'हे माता तेरे इन सत्य वाक्यों से मेरा मोह शान्त हो गया। पुण्यात्माओं का सम्पर्क किसके कल्याण के लिए नहीं होता ? ॥२५८॥ मेरे पूर्वजन्म के पापों के कारण मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ। अब उन पापों को धोने के लिए राग-द्वेष हीन होकर मैं तीर्थों की यात्रा करूँगा ॥२५९॥ अनंगप्रभा के कारण दूसरों से विरोध करने में मुझे क्या लाभ है? जिसने क्रोध को जीत लिया उसने सारे संसार को जीत लिया' ॥२६०॥ जीवदत्त के इस प्रकार कहते ही प्रियव्रता का पति वहाँ आ गया जो परम धार्मिक और अतिथियों का प्रेमी था ॥२४१॥ उसने भी जीवदत्त का आतिथ्य करके उसके दुःख को दूर किया। तब जीवदत्त उनके घर में विश्राम करके और उनसे सम्मति लेकर तीर्थयात्रा को चला गया ॥२४२॥ तदनन्तर निर्जन वनों में अनेक कष्टों को सहन करता हुआ और कन्द-मूल फल खाता हुआ वह पृथ्वी के सभी तीर्थों का भ्रमण करने लगा ॥२४३॥ सभी तीर्थों का पर्यटन करने के उपरान्त अन्त में उसी विन्ध्यवासिनी की शरण में आकर निराहार रहकर उसने कुश के आस्तरण पर कठिन तपस्या आरम्भ की ॥२४४॥