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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५१७ उसके तप से सन्तुष्ट अम्बिका ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप में उससे कहा—'उठो बेटा तुम चार मेरे गण हो। तीन तो पंचशूल, चतुर्वक्त्र और महावर हैं और चौथा तुम विकटवदन नाम का है ॥२४५ २४६॥ किसी समय तुम चारों गण विहार के लिए गंगा-तट पर गये। वहाँ कपिसजट नाम के मुनि की कन्या चापलता स्नान करती हुई तुम्हें दीख पड़ी और तुम लोग उसे देखकर काम से व्याकुल हो गये और उसकी इच्छा करने लगे ॥२४७-२४८॥ 'मैं ऋषी कन्या हूँ तुम लोग यहाँ से दूर हटो' उसके ऐसा कहने पर अन्य तीन गण तो चुप रहे किन्तु तुमने बलपूर्वक उसके हाथ पकड़ लिये ॥२४९॥ तब 'हे पिता हे पिता मुझे बचाओ'—इस प्रकार वह चिल्लाने लगी। उसका चिल्लाना सुनकर पास ही स्थित उसका पिता मुनि वहाँ आया। उसे देखकर तुमने उसे छोड़ दिया। तब मुनि ने तुम चारों को शाप दिया कि 'हे पापियो तुम मानव-लोक में जाओ' ॥२५० २५१॥ तब प्रार्थना करने पर मुनि ने इस प्रकार शाप का अन्त किया कि 'जब राजकुमारी अनंग प्रभा को तुम लोग सौंपोगे तब वह विद्याधर-लोक में चली जायगी। ये तीनों तो उसी समय शाप मुक्त हो जायेंगे किन्तु तुम विद्याधरी बनी हुई उसे पाकर भी गँवा दोगे ॥२५२ २५३॥ हे विकटवदन अब तुम महान् कष्ट प्राप्त करोगे और चिरकाल तक देवी की आराधना करके इस शाप से छूटोगे ॥२५४॥ तुमने उस चापलता कन्या के हाथ का स्पर्श किया है। इसलिए तुम्हे परदारापहरण का भारी पाप लगा है ॥२५५॥ इस प्रकार उस महर्षि ने मेरे गणों को जो शाप दिया, उसके परिणामस्वरूप तुम चारो दक्षिण दिशा में वीर रूप में उत्पन्न हुए थे। पंचशूष्टिक (जुलाहा) भाषाविज्ञानी (वैद्य) और गङ्गाधर (क्षत्रिय) ये तीनों और चौथा जीवदत्त चारो मित्र हुए ॥२५६ २५७॥ ये तीनों अनंगति के अपने पद को प्राप्त कर सम पर यहाँ आकर ही मेरी कृपा से शाप-मुक्त हुए ॥२५८॥ आज मेरी आराधना से तुम्हारा भी शाप नष्ट हो गया। इसलिए अब तुम मुझमें अग्नि सम्बन्धी धारणा रखकर अपना शरीर त्याग करो ॥२५९॥