कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम लम्बक ५१९ और, साठ जन्मों तक भोगने योग्य पाप को एक ही बार में भस्म कर दो। ऐसा कहकर और अग्नि की धारणा देकर देवी अन्तर्धान हो गई ॥२६०॥ उस जीवदत्त ने उस अग्नि की धारणा से अपने पापों और मानव-शरीर को दग्ध करके पाप से मुक्ति प्राप्त की और फिर वह गणों में श्रेष्ठ हो गया ॥२६१॥ परस्त्री के संगम से होनेवाले पाप के कारण जब देवताओं की भी इतनी दुर्दशा होती है, तब दूसरों की बात ही क्या है ? ॥२६२॥ उधर, इतने दिनों तक वह अनंगप्रभा राजा हरिवर के रनिवास में प्रधान रानी बन कर रही ॥२६३॥ वह राजा रात-दिन उसी की ओर आकृष्ट रहता था और उसने अपने राज्य का कार्य भार सुमन्त्र नाम के मन्त्री पर डाल दिया ॥२६४॥ एक बार उस राजा के पास मध्यदेश से लब्धवर नाम का नया नाट्याचार्य आया ॥२६५॥ राजा ने वाद्य-नाट्य में उसकी अपूर्व कुशलता देखकर उसे सम्मानित किया और रनिवास का नाट्याचार्य बना दिया ॥२६६॥ उसने अनंगप्रभा को नाट्य-शिक्षा में इतना प्रवीण कर दिया कि वह नाचती हुई भी अपनी सौतों के लिए ईर्ष्या का कारण बनती थी ॥२६७॥ उस नाट्याचार्य के सम्पर्क से और नृत्य की शिक्षा के रस से वह अनंगप्रभा नाट्याचार्य के प्रति प्रेम से आसक्त हो गई ॥२६८॥ नाट्याचार्य भी उसके सौन्दर्य और नृत्य से आकृष्ट होकर कामदेव द्वारा कुछ और ही प्रकार से नचाया जाने लगा ॥२६९॥ एकबार एकान्त में वह अनंगप्रभा रति की लालसा से नाट्यशाला में ही नाट्याचार्य द्वारा भ्रष्ट हो गई ॥२७ ॥ और, काम क्रीडा के अन्त में अत्यन्त अनुरागवती होकर उससे बोली—'मैं तुम्हारे बिना अब एक क्षण भी नहीं रह सकती। राजा हरिवर यह सब जानकर हमें कदापि क्षमा न करेगा। तो आओ कहीं दूसरे स्थान पर चलें। जहाँ राजा को हमारा पता न चले ॥२७१-२७२॥ तुम्हारे पास राजा द्वारा प्रदत्त सोना घोड़े ऊँट आदि धन है। मेरे नाट्य से प्रसन्न होकर राजा के दिये हुए आभरण मेरे पास हैं ॥२७३॥ तो चलो वहाँ चलें जहाँ निर्भय होकर रह सकें। उसकी ये बातें सुनकर प्रसन्न नाट्या चार्य ने उसे मान लिया ॥२७४॥