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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५२५ यह सुनकर और उन दोनों का परस्पर दूसरा ही भाव समझकर सुदर्शन ने कहा—'आज मैं भोजन के लिए तैयार नहीं हूँ' ॥३ ३॥ यह सुनकर बनिये ने कहा—'मित्र यदि ऐसा है तो तुम नहीं तो तुम्हारी स्त्री आज मेरे घर पर भोजन करे। क्योंकि यह पहले-पहल मेरे घर पर आई है॥३ ४॥ बनिया के ऐसा कहने पर सुदर्शन धूर्त होते हुए भी चुप रहा और बनिया उसकी स्त्री को लेकर घर के अन्दर चला गया ॥३ ५॥ घर में जाकर उसने एकाएक मिली हुई यौवन-मद से मत्त उस अनंगप्रभा के साथ भोजन मद्यपान आदि का सुख लिया। उधर सुदर्शन स्त्री की प्रतीक्षा में बाहर बैठा रहा। कुछ समय बाहर प्रतीक्षा में बैठे हुए सुदर्शन से बनिया के भेजे हुए उसके नौकरों ने आकर कहा—'तुम्हारी स्त्री भोजन करके घर चली गई, तुमने उसे जाते हुए नहीं देखा। इसलिए तुम यहाँ बैठे हुए क्या कर रहे हो जाओ अपने घर' ॥३ ६---३ ८॥ सुदर्शन ने उनसे कहा— अभी वह अन्दर है। गई नहीं इसलिए मैं नहीं जाऊँगा' ऐसा कहता हुआ सुदर्शन बनिया के नौकरों द्वारा लाठ-घूसों से मारकर बाहर निकाल दिया गया ॥३ ९॥ लात खाकर सुदर्शन अपने घर चला गया और सोचने लगा कि इस बनिये ने मित्र होकर भी मेरी स्त्री का अपहरण कर लिया ॥४१ ॥ मुझे इसी लोक में अपने किये का फल मिल गया जो दुष्कर्म मैंने दूसरे के लिए किया वही दूसरे ने मेरे साथ किया ॥३११॥ अतः दूसरे पर मैं क्रोध क्या करूँ? मेरा कर्म ही क्रोध करने योग्य है इसलिए अपने कर्मों का छेदन करता हूँ जिससे मेरा पुनर्जन्म और पुनः अपमान न हो ॥३१२॥ ऐसा सोचकर और क्रोध को छोड़कर वह जुआरी बदरिकाश्रम चला गया और वहाँ उसने संसार-बन्धन से मुक्त होने के लिए तपस्या की ॥३१३॥ इधर वह अनंगप्रभा अति सुन्दर और प्यारा वैश्य पति प्राप्त कर एक पुष्प से दूसरे पुष्प पर फिरती हुई भ्रमरी के समान आनन्द लेन लगी ॥३१४॥ धीरे धीरे अनंगप्रभा ने विपुल सम्पत्तिशाली उस प्रणयी वैश्य के प्राणों पर और उसकी सम्पत्ति पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया ॥३१५॥ उस देश के राजा वीरबाहु ने एकमात्र सुन्दरी उस अनंगप्रभा को वहाँ रहती हुई जानकर भी धर्म की मर्यादा रखते हुए उसका हरण नहीं किया ॥३१६॥