कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम लम्बक ५२७ कुछ दिनों में अनंगप्रभा के व्यय से बनिए का धन घट गया। क्योंकि दुराचारिणी स्त्री के घर में रहने पर, लक्ष्मी सदाचारिणी स्त्री के समान मुरझाने लगती है ॥३१७॥ धन का ह्रास देखकर वह वैश्य कुछ सामान एकत्र करके व्यापार के लिए सुवर्ण-द्वीप में जाने के लिए उद्यत हुआ ॥३१८॥ वियोग के भय से वह अनंगप्रभा को भी साथ लेकर चलता हुआ क्रमशः सागरपुर नाम के नगर में पहुँचा ॥३१९॥ र वहाँ समुद्र-तट पर बसे हुए उस नगर में रहनेवाला धीवरों का सरदार सागरवीर उस वैश्य से मिला ॥३२० ॥ उस समुद्रजीवी सागरवीर के साथ वह वैश्य समुद्र-तट पर आकर उससे लाये हुए जहाज पर अपनी पत्नी अनंगप्रभा के साथ सवार हो गया ॥३२१॥ वह वैश्य जब उस सागरवीर के साथ जहाज से जा रहा था तब एक दिन जलती हुई बिजली-रूपी आँखोंवाला प्रचंड त्रास तथा भय देनेवाला काला मेघ आकाश में दीख पड़ा ॥३२२-३२३॥ प्रचंड वायु के कारण मूसलाधार वृष्टि प्रारम्भ हुई। समुद्र में भयंकर तूफान उठा और जहाज समुद्र की लहरों में डूबने लगा ॥३२४॥ इस स्थिति में वैश्य हिरण्यगुप्त के सभी सेवक चिल्लाने लगे मानों उस जहाज के साथ उनका मनोरथ ही डूब रहा हो। तब हिरण्यगुप्त अपने दुपट्टे को कमर में बाँधकर अनंगप्रभा के मुंह की ओर देखकर 'हा प्रिये तू कहाँ' ऐसा कहकर डूबते हुए जहाज से समुद्र में कूद पड़ा ॥३२५-३२६॥ कूदकर हाथ फेंकते हुए उसे दैवयोग से बहती हुई एक लकड़ी की पट्टी हाथ लगी। उसे पकड़कर वह उसपर चढ़ गया ॥३२७॥ इधर अनंगप्रभा को भी उस सागरवीर ने बहुत तख्तों को रस्सी से बाँधकर बनाये हुए एक लम्बे चौड़े काष्ट-मञ्च पर शीघ्र ही चढ़ा दिया ॥३२८॥ और, स्वयं भी अनंगप्रभा को धीरज देता हुआ उसी पर चढ़ गया तथा हाथों से डाँड़ों का काम लेता हुआ वह समुद्र में तैरने लगा ॥३२९॥ जहाज के टूट जाने और डूब जाने पर पल-भर में आकाश मेघ-रहित तथा निर्मल हो गया। और, समुद्र क्षोभ के शान्त होने पर सज्जन हृदय के समान निश्चल हो गया ॥३३० ॥ एक तख्ते पर चढ़ा हुआ हिरण्यगुप्त अनुकूल वायु के चलने पर बहता हुआ पाँच दिनों में दैवयोग से समुद्र के तट पर आ गया ॥३३१॥