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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५४९ वह कार्पटिक उस सोने को बेचकर सुख से रहने लगा और उधर वह वेश्या भी किसी कार्य से राजा के समीप आई। उसने राजा के लिए उस सुन्दर और बड़े नींबू को उपहार स्वरूप भेंट किया। राजा ने नींबू को पहचानकर उसकी प्राप्ति का समाचार पूछा। तब वेश्या ने कहा—यह मुझे कार्पटिक ने दिया है। यह सुनकर राजा सोचने लगा कि वह कार्पटिक अब भी लक्ष्मी से नहीं देखा गया ! वह अभागा अब भी मेरी कृपा का सफल नहीं समझ रहा है। ये महान् रत्न बार-बार घूम-फिरकर मेरे ही पास लौट कर आ रहे हैं—॥६१-६३॥ ऐसा सोचकर उस नींबू को लेकर और उसे सुरक्षित रखकर राजा दैनिक कृत्य के लिए उठ गया ॥६४॥ इसी प्रकार चौथे दिन भी राजा ने वैसा ही दरबार किया और कार्पटिक को सामने बैठाकर उसी वार्ता का उससे कहवाया ॥६५-६६॥ और उसे उसी प्रकार वह नींबू दिया किन्तु आज शीघ्रता से उसके हाथ से छूट जाने के कारण उसके हाथ से भूमि पर गिरकर उस नींबू के दो टुकड़े हो गये ॥६७॥ और, उसके जोड़ खुल जाने के कारण रत्न उसमें से निकलकर बिखर गये। उन बहुमूल्य और उच्च कोटि के रत्नों से वह सारी स्थान भी जगमगाने लगा ॥६८॥ यह दृश्य देखकर वहाँ एकत्र लोग कहने लगे कि वास्तविक स्थिति को न जाननेवाले हम लोगों को मिथ्या भ्रम हुआ। राजा की कृपा तो इतनी बहुमूल्य है ॥६९॥ यह सुनकर राजा ने कहा—मैंने इस युक्ति से यह जानना चाहा कि लक्ष्मी इस पर प्रसन्न रहती है या नहीं। इस प्रकार, इसके भाग्य की परीक्षा की गई ॥७०॥ तीन दिनों तक उसके पापों का अन्त नहीं हुआ था वह आज हुआ है, इसीलिए लक्ष्मी ने इसे अभी दर्शन दिया ॥७१॥ ऐसा कहकर राजा ने रत्न और गाँव हाथी घोड़े सोना आदि देकर उस कार्पटिक को अपना एक सामन्त बना दिया ॥७२॥ अनन्तर उसकी प्रशंसा करती हुई उस सभा से उठकर राजा अपने नित्यकर्म के लिए चला गया और कार्पटिक भी अपने निवास-स्थान को गया ॥७३॥