कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 626 of 1079
Read in contextनवम लम्बक ५७९ माता-पिता को आँखों का आनन्द देनेवाला नरवाहनदत्त ने प्रतीक्षा करती हुई अपनी अन्यान्य पत्नियों को जाकर प्रसन्न किया ॥७८॥ वे सब चार वर्षों के समान चार बिना न सूखकर लकड़ी-सी हो गई थीं ? उन्होंने अपनी-अपनी विरह-वेदनाओं का वर्णन करते हुए नरवाहनदत्त को आनन्दित किया ॥७९॥ तब गोमुख ने वनवास के समय उनके रथ के घोड़ों की रक्षा करते हुए हाथों से ही सिंह आदि हिंसक जन्तुओं को मार डालने की प्रचण्डबाहु की वीरता का वर्णन किया ॥८०॥ इस प्रकार, आनन्द देनेवाली इधर-उधर की बातों को सुनते हुए और पत्नियों का मुखामृत पान करके उन्हें रिझाते हुए तथा और मन्त्रियों के साथ मद्यपान करते हुए नरवाहनदत्त के दिन सुखपूर्वक बीतने लगे ॥८१-८२॥ एक बार अलंकारवती के भवन में मित्रों के साथ बैठे हुए नरवाहनदत्त ने बाहर की ओर से ढोल-नगाड़ों का शब्द सुना ॥८३॥ तब उसने अपने सेनापति हरिशिख से कहा—'यहाँ अकस्मात् यह ढोल-नगाड़ों का शब्द कहाँ से और कैसे हो रहा है'? ॥८४॥ समुद्रवैश्य की कथा यह सुनकर बाहर निकलकर और तुरन्त लौटकर हरिशिख ने स्वामी नरवाहनदत्त से निवेदन किया—'स्वामी इस नगरी में समुद्र नाम का एक बनिया है। वह व्यापार के लिए यहाँ से सुवर्ण-द्वीप को गया ॥८५-५८६॥ वहाँ से लौटते हुए उसका अपना और कमाया हुआ भी धन समुद्र में जहाज के डूब जाने से नष्ट हो गया ॥८७॥ इस रूप में से वह बनिया दैवयोग से जीवित समुद्र के बाहर निकल आया और अपने घर पहुँच गया। आज उसे घर पहुँचे हुए छठा दिन है। इसी बीच जब वह अत्यन्त दुःखी होकर अपने घर रहता था तब उसने अपने बगीचे में एक गड़ा हुआ बहुत बड़ा खजाना पाया ॥८८-८९॥ यह बात उसने मन में विचारपूर्वक 'यह महाराज उदयन का प्राप्य है'। इसलिए आज उस क्षत्रिय ने स्वयं जाकर महाराज से निवेदन किया—॥९०॥ 'हे स्वामिन्! मैंने सुना है कि जो आप प्राप्त न हो वह भूमिस्थ खजाने से प्राप्त है यदि महाराज की आज्ञा हो तो मैं इसे लाकर महाराज की भेंट में अर्पित करूँ' ॥९१॥ समुद्र द्वारा यत्न से किये जाने पर उस नीच मनुष्य आश्चर्य में पड़ गया कि इस दीन समय द्वारा ऐसा कारण' ? ।