कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 650 of 1079
Read in contextनवम लम्बक ६३ इतना कहकर उसके चुप हो जाने पर मरुभूति ने कहा—'महाराज मुझे इसे दीनार देने हैं, किन्तु इस समय मेरे पास नहीं हैं। मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और अन्य सभी मन्त्रियों के हँसने पर नरवाहनदत्त ने मरुभूति से कहा—'यह क्या तुम्हारी मूर्खता है? तुम्हारी ऐसी बुद्धि अच्छी नहीं है। जाओ इसे तुरन्त दीनार दो' ॥७-९॥ स्वामी की यह बात सुनकर मरुभूति लज्जित हुआ और उसने उसी समय लाकर सौ दीनार उसे दिये ॥१०॥ तब गोमुख ने कहा— इस सम्बन्ध में मरुभूति निन्दनीय नहीं हो सकता क्योंकि यह ब्रह्मा की सृष्टि ही विचित्र चित्तवृत्तियों की है ॥११॥ आप लोगों ने विलम्ब से वेतन देनेवाले राजा और उसके सेवक के प्रसंग की कथा नहीं सुनी? ॥१२॥ राजा चिरदाता और उसके प्रसंग नामक भृत्य की कथा पूर्वकाल में चिरपुर नगर का राजा विलम्ब से वेतन देनेवाला था। उसके स्वयं सज्जन होने पर भी उसका परिवार अत्यन्त दुष्ट था ॥१३॥ किसी दूसरे देश से आकर प्रसंग नाम का सेवक अपने दो मित्रों के साथ उस राजा के यहाँ आकर सेवा करने लगा ॥१४॥ सेवा करते हुए उसके पाँच वर्ष व्यतीत हो गये किन्तु राजा ने उत्सव त्यौहार आदि के समय भी उसे कुछ नहीं दिया। उस सेवक का दोनों साथियों के प्रेरित करने पर भी अन्य अधिकारियों की दुष्टता के कारण अपने स्वामी से निवेदन करने का अवसर नहीं मिला ॥१५-१६॥ एकबार उस राजा का छोटा-सा पुत्र मर गया। उस समय दुःखित राजा का सभी नौकरों ने आकर घेर लिया ॥१७॥ उसी समय वह प्रसंग नामक सेवक साथियों के रोक जाने पर भी शोक के आवेश में राजा से बोला—॥१८॥ 'स्वामिन् ! हमलोग बहुत समय से सेवक हैं किन्तु आपने कभी हम कुछ नहीं दिया। फिर भी हमलोग आपके इस पुत्र की आशा से आश्वासित रहते थे कि यदि आपने हम कभी कुछ नहीं दिया तो यह हम लोगों को देगा पर उसे भी इस दैव ने ले लिया तब यहाँ अब हमारा क्या रह गया ? ॥१९-२०॥