कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम स्तम्बक ६१९ इसी समय वह राजा एक रानी के दो स्वर्ण-कलशों के समान वस्त्ररहित उत्तुंग कुचों को पानी के छींटा से मारने लगा ॥११९॥ यह देखकर मदनसुन्दरी के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वह कहने लगी 'तुम नदी का कितना क्षोभ करोगे' इतना कहकर और जल से बाहर निकलकर, क्रोध के साथ वस्त्र बदलकर अपनी सखियों से राजा की शिकायत करती हुई वह अपने भवन को चली गई॥ १२०-१२१॥ तब उसके भाव को समझकर राजा भी जलक्रीड़ा छोड़कर उसके (मदनसुन्दरी) निवास भवन को गया ॥१२२॥ वहाँ पर पिंजराँ में टँगे हुए शुकौँ से भी रोके जाते हुए राजा ने भीतर जाकर क्रोधातुर रानी को देखा ॥१२३॥ बायें हथेली पर खिन्न और म्लान मुख-कमल को रखी हुई, आँखों से बड़े-बड़े स्वच्छ मोतियों के समान आँसुओं की बूँदों को गिराती हुई, बँधे हुए कण्ठ से अस्पष्ट उच्चारण करती हुई और दाँतों की किरणों से मनोहर लगती हुई वह रानी अपभ्रंश भाषा में सुन्दर द्विपदी के इस टुकड़े को गा रही थी- यदि विरह नहीं सहा जाता तो तुम्हें मान छोड़ना चाहिए। हे हृदय ! यदि विरह सहा जाय तो मान को बढ़ाओ। ऐसा जानकर दोनों में से एक का निश्चय कर लो। अन्यथा दोनों किनारों पर पैर रखने से बीच में गिरकर अवश्य नष्ट हो जाओगे ॥१२४-१२७॥ इस प्रकार क्रोध में भी मनोहर लगती हुई मदनसुन्दरी के पास राजा कन्दर्प डरता और लजाता हुआ गया ॥१२८॥ मुँह फेरकर बैठी हुई उसे वह राजा अपने आभिधान और मधुर वचनों द्वारा नम्रता के साथ मनाने लगा ॥१२९॥ नवोत्कण्ठा से उसके अनुराग को बताती हुई सखियों के सामने ही मदनसुन्दरी के चरणों पर वह राजा अपने अपराधी आत्मा की निन्दा करता हुआ गिर पड़ा ॥१३०॥