कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextप्रथम लम्बक १२१ तब उस क्रोधाग्नि से ही मानों पिघलकर गिरते हुए आँसुओं से राजा को भिगोती हुई रानी गले से लिपट गई ॥१३१॥ तदनन्तर, राजा क्रुद्ध होकर प्रसन्न हुई रानी के ही पास उस दिन को व्यतीत कर रात्रि में भी उसके साथ आनन्द विलास करके सो गया ॥१३२॥ सोये हुए उसने अकस्मात् एक स्वप्न देखा कि एक कुरूपा स्त्री ने उसके गले से मोतियों की एक बड़ी माला और मुकुट के रत्न निकाल लिये हैं। उसके पश्चात् विविध प्राणियों के अंग वाले उसने दो बेतालों को देखा। उनके साथ बाहुयुद्ध होने पर राजा ने उन्हें भूमि पर पटक दिया और उनकी पीठ पर वह चढ़ बैठा। बेतालों ने पीठ पर बैठे हुए राजा को पक्षी के समान उड़कर समुद्र में लेजाकर फेंक दिया तदनन्तर किसी प्रकार समुद्र से निकले हुए राजा ने गले में मोतियों की माला और मुकुट में चूडामणि आदि रत्नों को पहले के ही समान देखा ॥१३३-१३६॥ यह स्वप्न देखकर प्रातः काल जगे हुए राजा ने मिलने के लिए आए हुये बौद्ध भिक्षु को देखकर स्वप्न का फल पूछा ॥१३७॥ बौद्ध भिक्षु ने कहा-महाराज आपके सामने अप्रिय बात नहीं कहनी चाहिए किन्तु आपसे पूछे जाने पर कैसे न कहूँ ॥१३८॥ आपने जो मोतियों की माला और चूडामणि का अपहरण देखा वह आपके पुत्र और महारानी के साथ वियोग का सूचक है। समुद्र से निकलकर जो तुमने उन दोनों वस्तुओं को पा लिया यह दुःख के अन्त में फिर से उन दोनों के मिलने का सूचक हैं-॥१३९ १४०॥ क्षपणक के इस प्रकार कहने पर कुछ सोचकर राजा ने कहा-'मुझे अभी तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ अब पहले वह उत्पन्न तो हो' ॥१४१॥ इसके उपरान्त आये किसी हुए रामायण की कथा कहनेवाले से राजा ने सुना कि राजा दशरथ ने पुत्र के लिए बहुत कष्ट उठाया ॥१४२॥ क्षपणक के चले जाने पर, राजा के मन में पुत्रोत्पत्ति की चिन्ता बढ़ गई। और, उसने उस दिन को बड़े खिन्न मन से बिताया ॥१४३॥