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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ६४९ जब उसे कोई उपाय नहीं सूझा तब पिंगदत्त नामक मन्त्री ने राजा विमल से कहा- 'स्वामिन् एक ही उपाय कल्याण के लिए है। उसे करो ॥१९३॥ स्थूलशिरा नाम का एक यक्ष है। उसका मन्त्र और आराधना-विधि मैं जानता हूँ जिससे वह अभीष्ट वर देता है ॥१९४॥ उसके मन्त्र को ग्रहण करके उससे पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना करो। इससे विरोध दूर होजायगा' ॥१९५॥ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर राजा ने उससे मन्त्र ग्रहण किया और उससे यक्ष की आराधना करके पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना की ॥१९६॥ उस यक्ष द्वारा जननेन्द्रिय प्राप्त हो जाने पर वह नपुंसक पुत्र प्रभाकर पूर्ण पुरुष हो गया किन्तु वह यक्ष नपुंसक हो गया ॥१९७॥ अब वह विद्याधरी प्रभाकर को पुरुषत्व से युक्त देखकर और उसके साथ यौन सुख का आनन्द लेकर सोचने लगी- ॥१९८॥ मैं अपने यौवन-मद में भूल कर गई। मेरा पति नपुंसक नहीं है। यह तो पूर्ण पुरुष है। अतः इसके सम्बन्ध में विपरीत मति नहीं करनी चाहिए ॥१९९॥ इस प्रकार विचार कर और इसी बात को पुनः पिता को लिखकर, साथ ही लज्जित होकर भी उसने यह सन्देश भेजा जिससे उसका पिता शान्त हो गया ॥२००॥ यह समाचार सुनकर आज क्रुद्ध हुए भैरव ने स्थूलशिरा यक्ष को बुलाकर शाप दिया-॥२०१॥ कि जननेन्द्रिय का त्याग करने से तूने नपुंसकता धारण की है अतः अब तू आजीवन नपुंसक ही बना रहेगा और वह प्रभाकर सदा के लिए पुरुष हो जायगा ॥२०२॥ इसलिए नपुंसक बना हुआ यह यक्ष आज बहुत दुःखी है और प्रभाकर भार्या-सुख के लिए पुरुष बनकर सुखी है॥२०३॥ इसी काम में आज भैरव का आने में कुछ विलम्ब होगया है। फिर फिर भी उन्हें आया ही समझो ॥२०४॥ कात्यायनी देवी जबतक उन योगिनी महात्मा से कह ही रही थीं कि इतने में ही भयङ्कर भैरवदेव आ ही गये और उन योगिनियों ने नाना प्रकारके उपहारों से उनका पूजन किया। भैरव ने भी कुछ समय तक उन योगिनियों के साथ मोद-प्रमोद किया ॥२०५॥ चन्द्रस्वामी ने वन पर बैठ बैठकर यह सब कुछ दृश्य देखा। वह कात्यायनी की एक दासी को देखा। उसने भी चन्द्रस्वामी को देखा॥२०६॥ ८२