कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextदशम लम्बक ७२५ हमारी बात न मान कर तुमने बलवानों से युद्ध ठान लिया इसलिए अब भी अवसर है कि बात मान जाओ। आओ इस हाथी से उतरकर और घोड़े पर बैठकर हम दोनों दूसरे देश को निकल चलें। जीते रहेय तो शत्रुओं को फिर जीत लेंगे ॥११-१२॥ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर राजा धीरे ग हाथी से उतरकर और घोड़े पर चढ़कर मन्त्री के साथ अपनी सेना में निकल गया और अपना वेश बदलकर उस मन्त्री के साथ वह उज्जयिनी नगरी को गया ॥१३-१४॥ उस नगरी में धन-सम्पत्तिवाली प्रसिद्ध वेश्या कुमुदिका के घर पर वह मन्त्री के साथ जाकर ठहर गया ॥१५॥ अकस्मात् ही राजा को अपने घर आया जानकर वेश्या ने भी समझा कि यह कोई असाधारण पुरुष है ॥१६॥ प्रताप से और लक्षणों से तो यह महाराजा-सा प्रतीत होता है। तब तो मेरा मनोरथ अवश्य ही सिद्ध होगा यदि इसने मेरा कार्य स्वीकार कर लिया ॥१७॥ इस प्रकार सोचकर, उठकर और स्वागत के साथ अगवानी करके कुमुदिका ने उस राजा