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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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रानी के साथ राज्य के ग्राहक उस राजा को एकबार उसके प्रबल कुटुम्बी बन्धुओं ने मिलकर राज्य से निकाल दिया ॥११॥ तब वह राजा रानी और कुछ सेवकों के साथ गुप्त रूप से वहाँ से चला और अपनी ससुराल आ गया ॥१११॥ मार्ग में जाते हुए जंगल में उसने अपने ऊपर आक्रमण करते हुए एक सिंह को अनायास तलवार के प्रहार से दो टुकड़े करके मार डाला ॥११२॥ और, उन्नत पैंतर के साथ घूमते हुए तथा आक्रमण करते एवं चिल्लाड़ते हुए हाथी के पैर और सूँड़ काटकर उसे गिरा दिया ॥११३॥ आगे चलकर मिले हुए चोरों के दल को उसने इस प्रकार काटकर गिरा दिया जैसे जंगली हाथी कमल के जंगल को रौंद डालता है॥११४॥ इस प्रकार, रानी के द्वारा देखा गया पराक्रमवाला वह राजा मार्ग तय करके मालव देश पहुँचा। तब बल का समुद्र वह राजा रानी से कहने लगा—॥११५॥ मार्ग का यह समाचार तुम अपने पिता के घर मत कहना। यह तो एक लज्जा की बात है। पराक्रम करने में क्षत्रिय की क्या प्रशंसा ? ॥११६॥ ऐसा रानी से कहकर वह राजा उसके साथ उसके पिता के भवन में गया। और, घबराकर समाचार पूछने पर उसने अपना समाचार (बन्धुओं द्वारा राज्य छीने जाने का) सुना दिया ॥११७॥ तब श्वशुर द्वारा सत्कृत होकर और हाथी घोड़े आदि सेना की सहायता प्राप्त कर वह अत्यन्त बलवान् राजा यज्ञावलोक के समीप गया ॥११८॥ और, शत्रुओं को जीतने में प्रयत्नशील राजा ने रानी कल्याणवती को वही पिता के ही घर पर रख दिया ॥११९॥ उस राजा के चले जाने पर और कुछ दिन बीतने पर एक बार, भवन की खिड़की में बैठी हुई रानी ने किसी पुरुष को देखा ॥१२० ॥ उस पुरुष ने देखते ही रानी के मन को मोह लिया और काम-वासना से प्रेरित रानी उस समय सोचने लगी—॥१२१॥ मैं भली भाँति यह जानती हूँ कि मेरे पतिदेव के समान सुन्दर और पराक्रमी दूसरा पुरुष नहीं है। फिर भी इस पुरुष की ओर मेरा मन खिंच रहा है। यह खेद है ॥१२२॥ अब जो भी हो, मैं इसे भोगूंगी ही। इस प्रकार सोचकर उसने अपना गुप्त भेद जाननेवाली सहेली से अपने मन का भाव प्रकट किया ॥१२३॥ और उसी के द्वारा उस रात्रि के समय खिड़की के मार्ग से रस्से के सहारे ऊपर चढ़ा कर अपने घर में बुला लिया ॥१२४॥ १