कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 808 of 1079
Read in contextदशम लम्बक ७११ यह सुनकर और 'ठीक है' इस प्रकार कहकर मनोरथप्रभा सोमप्रभ को वेषजय की गोद में बैठाकर फिर अपने आश्रम को ले गई ॥१४३॥ जैसे ही वे लोग आश्रम में पहुँचे वैसे ही सोमप्रभ का मन्त्री प्रियंकर, उसे ढूँढ़ता हुआ वहीं आया ॥१४४॥ इतने में ही उसके पिता के पास से 'शीघ्र आओ' इस प्रकार का सन्देश लेकर एक दूत भी वहाँ जा पहुँचा ॥१४५॥ तब सोमप्रभ मन्त्री की सम्मति से सारी सेना को लेकर पिता की आज्ञा का पालन करता हुआ अपने नगर को गया ॥१४६॥ 'पिताजी का दर्शन करके मैं तुरन्त आऊँगा' इस प्रकार जाते हुए सोमप्रभ ने मनोरथ प्रभा और वेषजय से कहा ॥१४७॥ तदनन्तर, वेषजय ने जाकर यह सब समाचार मकरन्दिका से कहा। इससे वह विरह से व्याकुल हो उठी ॥१४८॥ उसे (मकरन्दिका को) न तो उद्यान में शान्ति मिलती थी न संगीत में और न सहेलियों के बीच में। वह अब सुग्गे की भी विनोदपूर्ण बातियाँ नहीं सुनती थी ॥१४९-१५०॥ वह भोजन भी न करती थी शृंगार आदि करने की तो बात ही कहाँ ? माता और पिता द्वारा अनेक प्रयत्नों से समझाने पर भी उसकी अधीरता नहीं गई ॥१५१॥ वह कमलिनी के पत्तों की शय्या त्याग कर और पागलों की भाँति तुरन्त उठकर घूमने लगती थी। इस कारण उसके माता-पिता व्याकुल होते थे ॥१५२॥ बार-बार समझाते हुए माता-पिता की बातों को जब उसने नहीं माना तब क्रुद्ध माता- पिता ने उसे शाप दिया ॥१५३॥ तू अपने पूर्वजन्म की स्मृति को भूलकर इसी शरीर से दरिद्र निषादों (भीलों) के बीच कुछ समय तक रहेगी ॥१५४॥ माता-पिता से इस प्रकार शापित मकरन्दिका उसी समय निषाद के घर पर जाकर भील- कन्या बन गई ॥१५५॥ और उसी शोक से संतप्त उसका पिता सिंहविक्रम अपनी पत्नी के साथ ही मर गया ॥१५६॥ और वह पूर्वजन्म का ऋषि विद्याधरों का राजा जो सब शास्त्रों का ज्ञाता था पूर्वजन्म के किसी पाप के शेष रह जाने के कारण सुग्गा बन गया ॥१५७॥ ९५