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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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द्वादश लम्बक ४८९ और, वह कौए के साथ ही सिंह के पास आया । जब कौए ने सिंह से कहा-'स्वामी मैं आपके अधीन हूँ मुझे खाओ' ॥१५७॥ 'छोटे-से शरीरवाले तुझे मारकर ही क्या होगा ?' —सिंह के ऐसा कहने पर शियार बोला 'मैं भी आपके अधीन हूँ अतः मुझे मारकर खा लें। तब सिंह ने उसे भी छोटे शरीरवाला बता कर दूर कर दिया ॥१५८॥ तब बाघ ने कहा-'मुझे मारकर खाओ। किन्तु सिंह ने उसे भी नहीं मारा। तब ऊँट ने कहा—'मुझे खाओ' ॥१५९॥ इस प्रकार, साथी के कपट से बाघ ने ही उसे मारकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया और उन सिंह, बाघ सियार तथा कौओं ने मिलकर उसे खा डाला ॥१६०॥ इसी प्रकार किसी चुगलखोर ने बिना किसी कारण ही मेरे विरुद्ध राजा पिङ्गलक को उभारा है। अब जो भाग्य में होगा वह होगा ॥१६१॥ यदि हंसों के परिवारवाला कौवा भी राजा हो तो उसकी सेवा करनी चाहिए, किन्तु गीधों से सेवित हंसराज की भी सेवा नहीं करनी चाहिए। दूसरों की तो बात ही क्या है ॥१६२॥ संजीवक से यह सुनकर कुटिल दमनक बोला- धीरज से सब काम सिद्ध होते हैं। इस विषय में कथा कहता हूँ, सुनो —॥१६३॥ टिट्टिभ-दम्पती की कथा समुद्र के किनारे एक टिट्टिहरा अपनी टिट्टिहरी के साथ रहता था। टिट्टिहरी गर्भवती होने पर अपने टिट्टिहरे से बोली—॥१६४॥ 'चलो कहीं दूसरी जगह चलें क्योंकि यहाँ पर मेरे प्रसव होने पर कभी समुद्र अपनी लहरा में मेरे अंडा का हरण न कर लें ॥१६५॥ टिट्टिहरी की यह बात सुनकर टिट्टिहरा उससे बोला कि समुद्र मेरे साथ विरोध नहीं कर सकता ॥१६६॥ यह सुनकर टिट्टिहरी बोली, ऐसा न कहो। समुद्र के साथ तेरी क्या बराबरी ! इसलिए, हितकारी उपदेश को मानना चाहिए। नहीं तो विनाश होगा ॥१६७॥ कछुए और हंस की कथा किसी तालाब में कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ था। उसी तालाब में रहनेवाले विकट और संकट नाम के दो हंस उसके मित्र थे ॥१६८॥