कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextप्रथम स्तब्धक ७९१ प्रतिभासम्पन्न प्रत्युत्पन्नमति नाम का मच्छ निडर होकर वहीं रह गया। उसने सोचा कि जब भय सिर पर आ जायगा तब उसी समय उसका प्रतीकार किया जायगा ॥१८२॥ और, तीसरा यद्भविष्य यही सोचता रहा कि जैसा मेरा भविष्य होगा देखा जायगा। कुछ समय के पश्चात् धीवरों ने वहाँ आकर जाल लगाया ॥१८३॥ उन धीवरों ने जाल में फँसे हुए प्रत्युत्पन्नमति को मुर्दे के समान निश्चेष्ट देखकर मरा हुआ सा समझा और अपने-आप मरा जानकर उसे मारा नहीं बल्कि किनारे पर रख दिया किन्तु वह उछलकर फिर नदी के प्रवाह में गिरकर दूसरी ओर भाग गया ॥१८४-१८५॥ और, मन्दबुद्धि यद्भविष्य जाल में फँसकर इधर-उधर तड़फता हुआ धीवरों द्वारा मार डाला गया ॥१८६॥ इसलिए, मैं भी समय आने पर प्रतीकार करूँगा किन्तु समुद्र के भय से यहाँ से भागूँगा नहीं ॥१८७॥ टिट्टिभ-दम्पती की कथा (क्रमागत) ऐसा कहकर और पत्नी को धीरज बँधाकर टिट्टिहरा अपने घोंसले में ही डटा रहा ॥१८८॥ वहीं पर महासमुद्र उस टिट्टिहरे की अभिमानपूर्ण बातें सुनता रहा। कुछ दिनों में समय आने पर टिट्टिहरी ने अण्डे दिये ॥१८८॥ तब समुद्र ने टिट्टिहरे का तमाशा देखने की इच्छा से कि यह मेरा क्या बिगाड़ सकता है अपनी लहरों से उसके अण्डों को बहा लिया ॥१८९॥ तब टिट्टिहरी अपने पति से रोती हुई बोली कि मैं जो पहले से कह रही थी वही विपत्ति सिर पर आ गई ॥१९०॥ तब वह धैर्यशाली टिट्टिहरा अपनी टिट्टिहरी से बोला-देख मैं इस समुद्र का क्या करता हूँ ॥१९१॥ ऐसा कहकर उसने सभी पक्षियों को एकत्र करके अपनी दुर्दशा बताई और उनके साथ जाकर अपने राजा गरुड़ की शरण ली ॥१९२॥ उस गरुड़ से सब पक्षियों ने निवेदन किया कि 'महाराज आपके स्वामी रहते हुए हम लोग अनाथों के समान तिरस्कृत हो रहे हैं ॥१९३॥ तब वृद्ध गरुड़ के निवेदन करने पर भगवान् विष्णु ने आग्नेय अस्त्र से समुद्र को सुखाकर उसके अण्डे दिलवा दिये ॥१९४॥ इसलिए, बुद्धिमान् व्यक्ति को आपत्ति के समय धैर्य न छोड़कर, दृढ़ रहना चाहिए। अब तो इसी समय पिंगलक सिंह के साथ तेरा युद्ध होनेवाला है ॥१९५॥ १