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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ८११ तैलमूर्ख की कथा यह तो केशमूर्ख की कथा हुई अब तैलमूर्ख की कथा सुनो। किसी सज्जन के यहाँ एक मूर्ख सेवक था ॥१८८॥ उसे मालिक ने बनिये के पास तैल लाने के लिए भेजा। वह एक पात्र में बनिये से तैल लेकर चला ॥१८९॥ जब वह तैल का पात्र लेकर इधर आ रहा था तब उसके किसी मित्र ने उससे कहा—'देखो ध्यान दो। तैल का पात्र नीचे से चू रहा है' ॥१९० ॥ यह सुनकर उसने नीचे का भाग देखने के लिए उस पात्र को उलटा दिया और सारा तैल भूमि पर गिर पड़ा ॥१९१॥ यह देखकर लोग उसे हँसने लगे और स्वामी ने भी उसे नौकरी से निकाल दिया। इसलिए, मूर्ख की अपनी बुद्धि ही अच्छी उसे उपदेश न देना चाहिए ॥१९२॥ अस्थिमूर्ख की कथा तैलमूर्ख की कथा सुनी अब अस्थिमूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख पुरुष था और उसकी स्त्री व्यभिचारिणी थी ॥१९३॥ एक बार वह मूर्ख किसी कार्यवश दूसरे देश को गया। तब उसकी दुष्टा स्त्री ने अपने घर में काम करनेवाली सेविका को सिखा-पढ़ाकर अपना विश्वासी बना लिया और उस मन्द के लिए अपनी सेविका बनाकर अपने जार के साथ वह निश्चिन्तता-पूर्वक रमण करने लगी और उसने (स्वामी के) घर पर जा बैठी ॥१९४-१९५॥ कुछ समय पश्चात् घर आये हुए उस पति को पहले से ही सिखाई-पढ़ाई हुई दासी ने आँसुओं के साथ गद्गद स्वर में कहा—'तुम्हारी पत्नी मर गई और फेंक भी दी गई। ऐसा कहकर उसने उसे श्मशान में ले जाकर उसके दाहस्थान को दिखा दिया और दूसरे की एकत्र की हुई हड्डियाँ भी उसकी पत्नी की बताकर दिखा दीं। वह मूर्ख उन हड्डियों को लेकर रोने लगा ॥१९६॥ तदनन्तर उसका पिण्ड आदि कर्म करके और उसकी हड्डियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित करने का मार्ग उसकी श्राद्ध-क्रिया में लग गया ॥१९८॥ उसी दासी से अपना अग्राधिकारी ब्राह्मण बताकर लाये हुए पत्नी के जार को ही उसने श्राद्ध का ब्राह्मण बनाया और जिमाने लगा ॥१९ ॥ उसकी स्त्री भी प्रतिप्रयाण आदि पात्र के साथ आकर अन्य पंक्ति में यहाँ बने गुप्त पदार्थों का भोजन करती थी ॥२० ॥ और वह दासी उस अस्थिमूर्ख से कहती थी—स्वामिन् आपकी पत्नी सती धर्म के प्रभाव से परलोक न जाकर ब्राह्मण के साथ बैठकर स्वयं तुम्हारे यहाँ भोजन करती है ॥२०१॥