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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ८५९ इस कारण कौआ भी 'कहा तो ठीक' ऐसा सोचकर व्याकुल हुआ। केवल वाणी से उत्पन्न हुए असह्य वैर से किसे पश्चात्ताप नहीं होता ॥५९॥ इस प्रकार वाणी के अपराध से हमारे और उल्लुओं के बीच वैर हो गया। काकराज से इस प्रकार कहकर चिरजीवी फिर बोला—॥६० ॥ 'महाराज वे उल्लू संख्या में बहुत हैं और हमसे बलवान् भी हैं। इसलिए, युद्ध के द्वारा जीते नहीं जा सकते। अधिक संख्यावाले ही विजय प्राप्त करते हैं। इस सम्बन्ध में एक उदाहरण सुनो' ॥६१॥ ब्राह्मण और धूर्तों की कथा एक कोई ब्राह्मण एक बकरा खरीदकर और उसे कन्धे पर रखकर जा रहा था। उसे मार्ग में बकरा ठग लेने की इच्छा रखनेवाले कई धूर्तों ने देखा ॥६२॥ उनमें से एक ने उसके पास आकर घबराहट के साथ कहा—'ब्राह्मण देवता तुमम इस कुत्ते को कन्धे पर क्यों रख लिया ? इसे छोड़ो' ॥६३॥ यह सुनकर उसकी परवाह न करके ब्राह्मण आगे चला। तब उसे दूसरे दो धूर्त आगे मिले और बोले-'अरे, तुम जनेऊ और कुत्ता दोनों को एक साथ कन्धे पर रखे हुए हो कैसा ब्राह्मण हो? तब वह बकरे को भली भांति देखता हुआ कुछ आगे गया तो तीन और धूर्त उसे मिले और बोले— तुम अवश्य बहेलिये हो ब्राह्मण नहीं। इस कुत्ते के द्वारा मृगों को मारते हो' ॥६४—६६॥ यह सुनकर ब्राह्मण ने सोचा कि अवश्य ही किसी भूत ने मेरी आंखों का हरण कर मुझे धोखा दिया है, अन्यथा क्या ये सभी व्यक्ति इसे झूठ देख रहे हैं? ॥६७॥ यह सोचकर बकरे को वहीं छोड़कर और स्नान करके वह घर गया और उधर वे धूर्त उस बकरे को लेकर आनन्दपूर्वक खा गए ॥६८॥ कौए और उल्लुओं की कथा का संबंध ऐसा कहकर चिरजीवी काकराज से बोला—'अतः महाराज बहुत और बलवान् दुर्जय होते हैं। इसलिए, मैं इन बलवान् के साथ विरोध में जो कहता हूँ वह करो। तुम लोग मेरे पंखों को कुछ नोचकर इसी पेड़ के नीचे फेंककर उस पहाड़ पर चले जाओ। तबतक मैं कार्य करके (सफल होकर) आता हूँ ॥६९—७१ ॥ यह सुनकर काकराज सोच में कुछ पंखों को नोचकर और चिरजीवी को नीचे फेंककर मंन्त्री अपने अनुयायियों के साथ पहाड़ की ओर चला गया और चिरजीवी स्वयं उल्लुओं के