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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ११० कोई मूर्ख दूज का चाँद देखना चाहता था। उसे किसी ने अंगुली से दिखाते हुए कहा— 'वह है, देखो वह है।' वह मूर्ख आकाश को न देखकर उसकी अंगुली को ही देखता रह गया। उस हँसनवाले देखकर हँसत ही रह गये ॥३२-३३॥ असाध्य कार्य भी बुद्धि से सिद्ध होते हैं। इस पर कथा सुनो। एक स्त्री किसी दूसरे गाँव को अकेली जा रही थी। मार्ग में उसे पकड़ने के लिए जाते हुए एक बन्दर को देखकर अपने को उससे बार-बार बचाती हुई वह स्त्री एक पेड़ पकड़कर उसके चारों ओर घूमने लगी। उस मूर्ख बन्दर ने उस वृक्ष का दोनों हाथों से पकड़ लिया। स्त्री ने भी उसके दोनों हाथों को पकड़कर उसी वृक्ष में उलझा दिया ॥३४ - ३६॥ जब बन्दर शिथिल होकर क्रोध से भर गया तब मार्ग में जाते हुए किसी अहीर से उस स्त्री ने कहा—'हे भाग्यवान्, तुम इस बन्दर को इसी प्रकार हाथ से पकड़े रहो तो मैं खिसकी हुई चादर और गुथी हुई अपनी चोटी ठीक कर लूँ ॥३७-३८॥ उसने कहा—'यदि मेरे साथ तू रमण करे तो मैं ऐसा करूँ'। उस स्त्री ने स्वीकार कर लिया और उसने भी बन्दर को पकड़ लिया ॥३९॥ तब उस स्त्री ने उस पुरुष का कटार खींचकर और उससे बन्दर को मार डाला। तदनन्तर वह उस पुरुष से कहने लगी—'आओ वहीं एकान्त में चलें ऐसा कहकर वह स्त्री उस अहीर को दूर ले जाकर छोड़ दिया और अन्य यात्रियों के एक झुंड में मिलकर अपने गाँव को चली गई। इसप्रकार उसने बुद्धिबल से अपने चरित्र की रक्षा कर ली ॥४०-४१॥ इसलिए बुद्धि ही संसार का जीवन है। धन से हीन व्यक्ति जी सकता है किन्तु बुद्धि से व्यतिरिक्त जीवित नहीं रह सकता ॥४२॥ घट और कर्पर नाम के चोरों की कथा शिष्यों, अब एक और विचित्र कथा सुनो। किसी नगर में घट और कर्पर नाम के दो चोर थे। उनमें कर्पर किसी समय घट को बाहर रखकर और स्वयं राजमहल में जाकर राजा का बहुत-सा धन चुरा लाया। वहाँ पर एक अनन्य सुन्दर कन्या ने जगकर उससे मधुर आलाप में कहा 'चोर यदि हाथ के साथ यह हृदय चुराकर मुझे अपना बना ले ॥४३-४५॥