BharatKosha
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 979 of 1079

Read in context
Page 979

दशम लम्बक १२५ प्रातःकाल जप हुए साधु न देखा कि स्त्रिया म चंचलता (व्यभिचार) क सिवा न स्नेह है, न सज्जनता है। इसलिए, वह दुष्टा मुझे विश्वाम दिलाकर भी माछ छककर भाग गई। इतना ही लाभ हुआ कि उसन मुझ भी पट क समान मार नहीं डाला ॥१९३-१९४॥ ऐसा साचकर साधु अपन स्थान पर फर्मा गया राजपुत्री भी बनिय के साथ उसक देग जा पहुँची ॥१९५॥ अपन देश पहुँचकर धनदेव सोचन लगा कि मैं इस दुराचारिणी दुष्टा को एकाएक अपने पर में कैसे ल जाऊँ? ॥१९६॥ तब वह बनिया अपने नगर म सायंकाल के समय उस राजकुमारी के साथ एक वृद्धा स्त्री के घर में चला गया और वहीं ठहर गया ॥१९७॥ वहाँ पर उस राजकुमारी न उम जानकार वृद्धा स पूछा कि 'क्या तुम धनदेव के घर का हाल जानती हो ? ॥१९८॥ यह सुनकर बुद्धा बोली--'उमक घर की क्या बात है। उसकी पत्नी जहाँ-तहाँ सरा सब पुरुष क साथ रमण करती है ॥१९९॥ उसकी खिड़की म रस्सी स बँधी चमड़े की पिटारी लटकती रहती है। रात में जो भी उस पिटारी में घुसता है, उसे ही वह ऊपर बुला लती है ॥२ ००॥ रात के अन्त म उस उसी प्रकार बाहर निकाल देती है। मद्यपान स उन्मत्त वह कहीं कुछ देखती नहीं ॥२ ०१॥ उसकी यह स्थिति इस सारे नगर म प्रसिद्ध हो गई है। बहुत समय हो गया उसका पति अब भी नहीं आया ॥२ ०२॥ उस वृद्धा की बात सुनकर मन-ही-मन बुखी और सन्देह म पड़ा हुआ धनदेव किसी बहाने अपन घर गया। वहाँ पर उसने दासिमों द्वारा रस्सी में बाँधी हुई पिटारी देखी। वह उसमें बैठ गया और दासिया ने उसे ऊपर खींचकर भीतर कर लिया ॥१ ३ १ ४॥ उसके भीतर जाते ही नशे में चूर और काम में अन्धी स्त्री ने उसका आलिंगन करके उस खाट पर पटक दिया। नशे में मत्त रहने के कारण उसकी स्त्री ने उसे पहचाना भी नहीं ॥१ ५॥ अपनी पत्नी की यह दुरवस्था देख उस धनदेव की रमणेच्छा नहीं रह गई और तब तक नषे की तीव्रता के कारण उसकी पत्नी भी सो गई ॥१ ६॥ रात का अन्त होने पर उसकी दासियों ने उसे उसी प्रकार पिटारी में भरकर बाहर फेंक दिया। बाहर निकाला हुआ धनदेव बनिया सोचने लगा--॥१ ७॥