कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 993 of 1079
Read in contextद्वादश लम्बक १५१
वह कहती थी—'यह मेरा पति है और शत्रुओने इसके हाथ-पैर काट दिये हैं। मैं पतिव्रता हूँ इसलिए भीख मांगकर भी पति को जिलाती हूँ। इसलिए, मुझे भिक्षा दो' ॥२९॥ इस प्रकार, गांव-गांव और नगर-नगर में भीख मांगती हुई वह दुष्टा स्त्री उस नगर म पहुँची जहाँ उसका पहला पति राज्य करता था ॥३०॥ इसी प्रकार वहाँ भीख मांगती हुई वह पतिव्रता होने के कारण जनता में खूब मानी जाने लगी। धीरे-धीरे राजा के कानों में भी उसकी प्रशंसा पहुँची ॥३१॥ राजा ने भी पीठ पर रूंड को चढ़ाई हुई उसे बुलवाया और भली भांति उसे पहचान कर पूछा कि 'क्या तू ही वह पतिव्रता है ?' ॥३२॥ उस पापिनी ने भी राजलक्ष्मी के तेज से परिवर्तित स्वरूपवाले अपने उस पति को न पहचान कर कहा—'हाँ महाराज मैं वही पतिव्रता हूँ' ॥३३॥ तब बोधिसत्त्व का अंश वह राजा हँसकर बोला—'इस परिणाम से मैं ने भी तेरा पातिव्रत्य देख लिया। तू वह मनुष्य-रूपी राक्षसी है जिसे तेरा पति अपना रक्त और मांस देकर भी वश में न कर सका और शरीरहीन रूंड ने तुझे अपना बाहुन बनाया। क्या यह वही तेरा निष्पाप पति है जिस तूने नदी में फेंक दिया था। उसी कर्म से तू इस रूंड को ढो रही है और पाल रही है ?' ॥३४-३५॥ इस प्रकार, गुप्त रहस्य को खोलनेवाले उस अपने पति को पहचानकर वह स्त्री भय से मूर्च्छित-सी चित्र-लिखित और मूक-सी हो गई ॥३८॥ तदनन्तर, कौतुक-भरे मन्त्रियों से 'महाराज यह क्या बात है ?' इस प्रकार पूछे गये राजा ने सब सत्य समाचार उन्हें सुना दिया ॥३९॥ तब मन्त्रियों ने उसे पति-विरोधिनी जानकर उसके नाक-कान कटवा दिये और उस रूंड के साथ उसे उस नगर से बाहर निकलवा दिया ॥४०॥ नकटी को रूंड के साथ और राजलक्ष्मी को बोधिसत्त्व के साथ मिलाते हुए दैव ने समान संयोग का उदाहरण प्रदर्शित किया ॥४१॥ इस प्रकार विवेकहीन और निम्न चित्तवृत्तिवाली स्त्रियों की चित्तवृत्ति दैव-गति के समान नहीं जानी जा सकती ॥४२॥ इसी प्रकार, अपने स्वभाव और चरित्र के रक्षक विशाल हृदयवाले और क्रोध पर विजय करनेवाले व्यक्तियों को सम्पत्तियां मान प्रसन्न होकर बिना साध ही प्राप्त हो जाती हैं ॥४३॥