कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
by स्वामी महेश्वरानन्द गिरि
Source: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (origin)
Page 16 of 56
Read in context१४ जो इस प्रकार जानता है, उसका परम रहस्य व्रत यह है कि वह किसी से कुछ न मांगे। जैसे एक मनुष्य ग्राम में भिक्षा मांगने जाता है, तब उसको कुछ नही मिलता तब वह ऐसा कह कर बैठता है कि अब मैं भिक्षा में मिला हुआ भक्षण न करूंगा, तब जो लोग भिक्षा देने के लिये मना करते थे वे भी उसको बुलाकर कर देने लगते हैं। जो याचना नहीं करता उसका इस प्रकार का धर्म हैं, परन्तु धन देने वाले ‘हम तुझको देंगे’ ऐसा कह कर बुलाते हैं ।।४।। प्राणो ब्रह्मेति ह स्माह पैंग्यस्तस्य ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो वाक्व परस्ताच्चक्षुरारुन्धे ।।५।। पैंग्य बोला :- प्राण यह ही ब्रह्म है। प्राण रूप ब्रह्मको वाणी के पीछे चक्षु आवरण करते हैं, चक्षु के पीछे श्रोत्र आवरण करते हैं। श्रोत्र के पीछे मन आवरण करता है और मन के पीछे प्राण आवरण करते हैं।।५।। तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मण एताः सर्वा देवता अयाचमानाय बलिं हरन्ति तथा एवास्मै सर्वाणि भूतान्ययाचमानाय बलिं हरन्ति य एवं वेद। यस्योपनिषन्न याचेदिति तद्यथा ग्रामं भिक्षित्वा लब्ध्वोपविशेन्नाहमतो दत्तमश्नीयामिति य एवैनं पुरस्तात्प्रत्याचक्षीरंस्त एवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इत्येष धर्मो याचितो भवत्यनन्तरस्त्वे वैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इति ।।६।। देवता-इन्द्रियां न मांगने पर इस प्राण रूप ब्रह्म को बलि लाकर देते हैं। इसी प्रकार प्राण की ब्रह्म रूप से उपासना करने वाले को नहीं मांगने पर भी प्राणी बलि लाकर देते हैं। ऊपर के समान नहीं मांगने वाले को सब देते हैं ।।६।। अथात एकधनावरोधनं यदेकधनमभिध्यायात्पौर्णमास्यां