कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ८ : अ० १२ ] कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा ३९
(१) क्रुद्धलुब्धभीतावमानिनस्तु परेशां कृत्याः। तेषां कार्तान्तिक-नैमित्तिकमौहूर्तिकव्यञ्जनाः परस्पराभिसम्बन्धम् अमित्रप्रतिसम्बन्धं वा विद्युः। (२) तुष्टानर्थमानाभ्यां पूजयेत्। अतुष्टान् सामदानभेददण्डैः साधयेत्। (३) एवं स्वविषये कृत्यानकृत्यांश्च विचक्षणः। परोपजापात् संरक्षेत् प्रधानान् क्षुद्रकानपि ॥
इति कौटलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे स्वविषये कृत्याकृत्यपक्षरक्षणं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥
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ही उनका वध करवा दिया जाय अथवा असन्तुष्ट जनपद से ही उनका दमन करा दिया जाय।
( १ ) इन लोगों के दमन के लिए एक दूसरा तरीका यह भी है कि राजा उनके स्त्री-बच्चों को अपने अधिकार में करले और उन्हें खदान के कार्य में भेज दिया जाय। क्योंकि ऐसा भी संभव है कि ये असन्तुष्ट लोग शत्रुपक्ष में जाकर मिल जाय। प्रायः ऐसा देखा गया है कि क्रोधी, लोभी, डरपोक और अपमानित लोग सहज ही शत्रु के वश में हो जाते हैं।
( २ ) जो व्यक्ति सन्तुष्ट हों, राजा उन्हें और भी धन-मान से सत्कृत करे। किन्तु असन्तुष्ट व्यक्तियों को साम, दाम, दण्ड, भेद जैसे भी बन पड़े, अपने वश में करे।
( ३ ) इस प्रकार बुद्धिमान् राजा को चाहिए कि अपने राज्य के छोटे-बड़े कृत्य अकृत्य लोगों को वह, किसी भी प्रकार, शत्रु के पक्ष में जाने से रोके।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में बारहवाँ अध्याय समाप्त।
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