कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १६ : अ० २० ] आत्मरक्षा का प्रबन्ध ७१
(१) विषप्रदस्य तु शुष्कश्यामवक्त्रता वाक्सङ्गः स्वेदो विजृम्भणं चातिमात्रं वेपथुः प्रस्खलनं वाक्यविप्रेक्षणमावेशः कर्मणि स्वभूमौ चानवस्थानमिति । (२) तस्मादस्य जाङ्गुलीविदो भिषजश्चासन्नाः स्युः । (३) भिषग्भैषज्यागारादास्वादविशुद्धमौषधं गृहीत्वा पाचकपोषकाभ्यामात्मना च प्रतिस्वाद्य राज्ञे प्रयच्छेत् । पानं पानीयं चौषधेन व्याख्यातम् । (४) कल्पकप्रसाधकाः स्नानशुद्धवस्त्रहस्ताः समुद्रमुपकरणमन्तर्वंशिकहस्तादादाय परिचरेयुः । (५) स्नापकसंवाहकास्तरकरजकमालाकारकर्म दास्यः कुर्युः;
स्फटिक मणि आदि धातुओं पर यदि विष का प्रयोग किया गया हो तो उनकी आभा पंकिल दिखाई देती है, उनकी चमक, भारीपन और पहिचान आदि सब जाते रहते हैं । यहाँ तक विषमिश्रित पदार्थों के पहिचान की विधियों का निरूपण किया गया है ।
विष देने वाले की पहिचान
( १ ) विष देने वाले का मुँह सूख जाता है, उसके चेहरे का रंग बदल जाता है, बात-चीत करते हुए उसकी वाणी लड़खड़ाने लगती है, उसको पसीना, कंपकंपी तथा जंभाई आने लगती है, बेचैन होकर वह गिर पड़ता है, संदेहवश दूसरों की बातें वह ध्यानपूर्वक सुनने लगता है, बात-बात में वह आवेश करने लगता है; अपने कार्य और अपने स्थान पर उसका मन स्थिर नहीं रह पाता है ।
( २ ) इसलिए विषविद्या के जानकार और वैद्य राजा के समीप अवश्य रहें ।
( ३ ) वैद्य को चाहिए कि औषधालय में स्वयं खाकर परीक्षा की हुई औषधि को वह राजा के सामने लाकर उसमें से कुछ को पकाने-पीसने वाले लोगों को और कुछ स्वयं भी खाकर पुनः राजा को दे । इसी प्रकार जल तथा मद्य को भी, परीक्षा करने के उपरांत, राजा को देना चाहिए ।
परिजनों के कर्त्तव्य
( ४ ) दाढ़ी-मूंछ बनाने वाले नाई तथा वस्त्रालंकरण धारण कराने वाले परिचारकों को चाहिए कि वे स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किये हाथों को अच्छी तरह धोकर राजमहल के अंदर रहने वाले कंचुकी आदि से मुहर लगे हुए उस्तरा और वस्त्राभूषण को लेकर राजा की परिचर्या करें ।
( ५ ) राजा को स्नान कराना, उसके अंगों को दबाना, बिस्तर बिछाना, कपड़े