कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
Page 162 of 918
Read in context७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
रूपदायकानि प्रयच्छेत् । अध्यक्षसङ्ख्यायकादिभ्यो गोपस्थानिकानीकस्थ-चिकित्साश्वदमकजङ्घाकरिकेभ्यश्च विक्रयाधानवर्जम् ।
(१) करदेभ्यः कृतक्षेत्राण्यैकपुरुषिकाणि प्रयच्छेत् । अकृतानि कर्तृभ्यो नादेयात् ।
(२) अकृषतामाच्छिद्यान्येभ्यः प्रयच्छेत् । ग्रामभृतकवैदेहका वा कृषेयुः । अकृषन्तोऽपहीनं दद्युः । धान्यपशुहिरण्यैश्चैनानुगृह्णीयात् । तान्यनु सुखेन दद्युः ।
(३) अनुग्रहपरिहारौ चैभ्यः कोशवृद्धिकरौ दद्यात् । कोशोपघातिकौ वर्जयेत् । अल्पकोशो हि राजा पौरजानपदानेव ग्रसते । निवेशसमकालं यथागतकं वा परिहारं दद्यात् । निवृत्तपरिहारान् पितेवानुगृह्णीयात् ।
वापिस भी न ले । इसी प्रकार विभागीय अध्यक्षों, संख्यायकों ( क्लर्कों ), गोपों ( दस-दस गाँवों के अधिकारियों ), स्थानिकों ( नगर के अधिकारियों ), अनीकस्थों ( हस्तिशिक्षकों ), वैद्यों, अश्वशिक्षकों और जंघाकरिकों ( दूर देश में जीविकोपार्जन करने वाले लोगों ) आदि अपने अधिकारियों, कर्मचारियों और प्रजाजनों के लिए भी राजा भूमि-दान करे । किन्तु इस प्रकार पायी हुई जमीन को बेचने या गिरवी रखने के लिए वर्जित कर दे ।
( १ ) खेती के उपयोगी जो भूमि लगान पर जिस भी किसान के नाम दर्ज की जाय, उसके मर जाने के बाद राजा को अधिकार है कि वह उस भूमि को मृतक किसान के पुत्र आदि को दे या न दे ।
( २ ) किंतु ऐसी ऊसर या बंजर जमीन जिसको किसान ने अपने श्रम से खेती योग्य बनाया है, राजा को चाहिए कि उसे कभी भी वापिस न ले, ऐसी जमीन पर किसानों को पूर्ण अधिकार प्राप्त होना चाहिए । यदि कोई किसान किसी खेती योग्य भूमि को बिना जोते-बोये परती ही डाले रहता है तो राजा को चाहिए कि ऐसे किसान से उस भूमि को छीन कर किसी जरूरतमंद दूसरे किसान को दे दे । ऐसे जरूरतमंद किसान के न मिलने पर गाँव का मुखिया या व्यापारी उस जमीन पर खेती करे । खेती करने की शर्त पर यदि कोई जमीन को ले और उसमें खेती न करे तो उससे उसका हर्जाना वसूल करना चाहिए । राजा को चाहिए कि वह अन्न, बीज, बैल और धन आदि देकर किसानों की सहायता करता रहे और किसानों को भी चाहिए कि फसल कट जाने पर सुविधानुसार धीरे-धीरे वे उधार ली हुई वस्तुओं को राजा को वापिस कर दें ।
( ३ ) किसानों की स्वास्थ्य-वृद्धि और रुग्णता-निवारण के लिए राजा उन्हें परिमित धन देता रहे, जिससे कि वे धन-धान्य की वृद्धि करके राजकोष को समृद्ध बनावें । किन्तु इस प्रकार की सहायता से यदि राजकोष को कोई हानि पहुँचे, तो