कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
कुमारीपुरं, मुण्डहर्म्यं द्वितलं मुण्डकद्वारं, भूमिद्रव्यवशेन वा। त्रिभागा- धिकायामा भाण्डवाहिनीः कुल्याः कारयेत् । (१) तासु पाषाणकुद्दालकुठारीकाण्डकल्पनाः । मुसुण्डिमुद्गरा दण्डचक्रयन्त्रशतघ्नयः ॥ कार्याः कार्मारिकाः शूला वेधनाग्राश्च वेणवः । उष्ट्रग्रीव्योऽग्निसंयोगाः कुप्यकल्पे च यो विधिः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे दुर्गविधानं नाम तृतीयोध्यायः; आदितस्त्रयोविंशः ॥
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दुमंजिला हो एवं जिस पर कंगूरे आदि न लगे हों, उसे मुण्डकद्वार कहते हैं । इस प्रकार राजा अपनी भूमि और संपत्ति के अनुसार जैसा उचित समझे, कुछ परिवर्तन करके दरवाजों को बनवाये । किले के अन्दर की नहरें सामान्य नहरों से तिगुनी चौड़ी बनवाये, जिनके द्वारा हर प्रकार का सामान अन्दर और बाहर ले जाया-लाया जा सके ।
( १ ) पत्थर, कुदाली, कुल्हाड़ी, बाण, हाथियों का सामान, गदा, मुद्गर, लाठी, चक्र, मशीनें, तोपें, लोहारों के औजार, लोहे का बना सामान, नुकीले भाले, बाँस, ऊँट की गर्दन के आकार वाले हथियार, अग्निबाण आदि सामान नहर के द्वारा लाया और ले जाया जाता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तीसरा अध्याय समाप्त ।
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