कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| १०० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
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(१) पुष्पफलवाटषण्डकेदारमूलवापाः सेतुः । (२) पशुमृगद्रव्यहस्तिवनपरिग्रहो वनम् । (३) गोमहिषमजाविकं खरोष्ट्रमश्वाश्वतराश्च व्रजः । (४) स्थलपथो वारिपथश्च वणिक्पथः । (५) इत्यायशरीरम् । मूलं भागो व्याजी परिघः कॢप्तं रूपिकमत्यय-श्चायमुखम् । (६) देवपितृपूजादानार्थं स्वस्तिवाचनमन्तःपुरं महानसं दूतप्रावार्तिमं कोष्ठागारमायुधागारं पण्यगृहं कुप्यगृहं कर्मान्तो विष्टिः पत्त्यश्वरथद्विप-परिग्रहो गोमण्डलं पशुमृगपक्षिव्यालवाटाः काष्ठतृणवाटश्चेति व्यय-शरीरम् । (७) राजवर्षं मासः पक्षो दिवसश्च व्युष्टम् । वर्षाहिमन्तग्रीष्माणां तृतीयसप्तमा दिवसोनाः पक्षाः, शेषाः पूर्णाः । पृथगधिमासक इति कालः ।
(१) सेतु : फूल, फल, केला, सुपारी, अन्न के खेत, अदरक और हल्दी के खेत इन सबको सेतु कहा जाता है ।
(२) वन : हरिण आदि पशु, लकड़ी आदि द्रव्य और हाथियों के जंगल को वन कहा जाता है ।
(३) व्रज : गाय, भैंस, बकरी, भेड़, गधा, ऊँट, घोड़ा, खच्चर आदि जानवर व्रज नाम से कहे जाते हैं, क्योंकि वे अपने गोष्ठ (व्रज) में रहते हैं ।
(४) वणिक्पथ : स्थलमार्ग और जलमार्ग, व्यापार के इन दो मार्गों को वणिक्पथ कहा जाता है ।
(५) ये सभी आमदनी के साधन हैं । इनके अतिरिक्त मूल (अनाज, साग, सब्जी आदि को बेचकर एकत्र किया गया धन), भाग (पैदावार का षष्ठांश), व्याजी (कपटी व्यापारियों से दण्ड रूप में वसूल किया गया धन), परिघ (लावारिस का धन), कॢप्त (नियत कर), रूपिक (नमककर), अत्यय (जुरमाने का धन), आदि भी आमदनी के साधन हैं ।
(६) देवपूजा, पितृपूजा, दान, स्वस्तिवाचन आदि धार्मिक कृत्य, अन्तःपुर, रसोईघर, दूत प्रेषण, कोष्ठागार, शस्त्रागार, पण्यगृह, कुप्यगृह का व्यय कर्मान्त (कृषि, व्यापार); विष्टि (बेगारी का व्यय), पैदल, हाथी, घोड़ा तथा रथ आदि चारों प्रकार के सेना-संग्रह का व्यय, गाय, भैंस, बकरी आदि उपयोगी पशुओं का व्यय, हरिण, पक्षी तथा अन्य हिंसक जंगली जानवरों की रक्षा के लिए किया गया व्यय और स्थान, लकड़ी, घास आदि के जंगलों की सुरक्षा के लिए किया गया व्यय, ये सभी व्यय के स्थान कहलाते हैं ।
(७) राजा के राज्याभिषेक के बाद, उसके प्रत्येक कार्य में 'व्युष्ट' नाम से कहे