कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण २४ | ## समुदयस्य युक्तापहृतस्य प्रत्यानयनम् |
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| अध्याय ८ |
(१) कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः । तस्मात् पूर्वं कोषमवेक्षेत । (२) प्रचारसमृद्धिश्चरित्रानुग्रहश्चोरग्रहो युक्तप्रतिषेधः सस्यसम्पत् पण्यबाहुल्यमुपसर्गप्रमोक्षः परिहारक्षयो हिरण्योपायनमिति कोषवृद्धिः । (३) प्रतिबन्धः प्रयोगो व्यवहारोऽवस्तारः परिहापणमुपभोगः परिवर्तनमपहारश्चेति कोषक्षयः । (४) सिद्धीनामसाधनमनवतारणमप्रवेशनं वा प्रतिबन्धः । तत्र दशबन्धो दण्डः । (५) कोषद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगः प्रयोगः ।
अध्यक्षों द्वारा गबन किये गये धन की पुनः प्राप्ति
(१) सारे कार्य कोष पर निर्भर हैं । इसलिए राजा को चाहिए कि सबसे पहिले कोष पर ध्यान दे ।
(२) राष्ट्र की सम्पत्ति को बढ़ाना, राष्ट्र के चरित्र पर ध्यान रखना, चोरों पर निगरानी रखना, राजकीय अधिकारियों को रिश्वत लेने से रोकना, सभी प्रकार के अन्नोत्पादन को प्रोत्साहित करना, जल-स्थल में उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक व्यापार-योग्य वस्तुओं को बढ़ाना, अग्नि आदि के भय से राज्य की रक्षा करना, ठीक समय पर यथोचित कर वसूल करना और हिरण्य आदि की भेंट लेना, ये सब कोषवृद्धि के उपाय हैं ।
(३) कोषक्षय के आठ कारण हैं : १. प्रतिबन्ध, २. प्रयोग, ३. व्यवहार, ४. अवस्तार, ५. परिहायण, ६. उपभोग, ७. परिवर्तन और ८. अपहार ।
(४) राजकर को वसूल करना, वसूल करके उसे अपने अधिकार में न रखना, और अधिकार में करके भी उसे खजाने में जमा न करना, यह तीन प्रकार का प्रतिबन्ध है । जो अध्यक्ष इन माध्यमों से कोष का क्षय करे, उस पर क्षत राशि से दशगुना जुर्माना करना चाहिए ।
(५) कोषधन का स्वयं ही लेन-देन करके वृद्धि का यत्न करना प्रयोग कहलाता है । ऐसे अधिकारी पर दुगुना जुर्माना करना चाहिए ।