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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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Page 205

प्र० २६ : अ० १० ] शासनाधिकार १२१

(१) निन्दा प्रशंसा पृच्छा च तथाख्यानमथार्थना । प्रत्याख्यानमुपालम्भः प्रतिषेधोऽथ चोदना ॥ सान्त्वमभ्यवपत्तिश्च भर्त्सनानुनयौ तथा । एतेष्वर्थाः प्रवर्तन्ते त्रयोदशसु लेखजाः ॥

(२) तत्राभिजनशरीरकर्मणां दोषवचनं निन्दा। गुणवचनमेतेषामेव प्रशंसा। कथमेतदिति पृच्छा। एवम् इत्याख्यानम्। देहीत्यर्थना। न प्रयच्छामीति प्रत्याख्यानम्। अननुरूपं भवत इत्युपालम्भः। मा कार्षीः इति प्रतिषेधः। इदं क्रियतामिति चोदना। योऽहं स भवान्, मम यद् द्रव्यं तद्भवतः इत्युपग्रहः सान्त्वम्। व्यसनसाहाय्यमभ्यवपत्तिः। सदोषमायति-प्रदर्शनमभिभर्त्सनम्।

(३) अनुनयस्त्रिविधोऽर्थकृतावतिक्रमे पुरुषादिव्यसने चेति।

(४) प्रज्ञापनाज्ञापरिदानलेखास्तथा परीहारनिसृष्टिलेखौ। प्रवृत्तिकश्च प्रतिलेख एव सर्वत्रगश्चेति हि शासनानि ॥


यदि लेख में पूरी बातें न लिखी गई हों तो अन्त में वाचिकमस्य (शेष अंश पत्र-वाहक के मुँह से सुन लीजिए), इस प्रकार लिख देना चाहिए।

(१) निन्दा, प्रशंसा, पृच्छा, आख्यान, अर्थना, प्रत्याख्यान, उपालम्भ, प्रतिषेध, चोदना, सान्त्वना, अभ्यवपत्ति, भर्त्सना और अनुनय इन्हीं तेरह बातों में से ही किसी बात को प्रकट किया जाता है।

(२) किसी के वंश, शरीर और कार्य में दोषारोपण करना निन्दा है। उन्हीं बातों के सम्बन्ध में गुणगान करना प्रशंसा है। 'यह कैसा हुआ?' इस प्रकार पूछना ही पृच्छा है। 'इसको इस प्रकार करना चाहिये' ऐसा कहना आख्यान है। 'दीजिए' इस प्रकार माँगना अर्थना है। 'नहीं देता हूँ' इस प्रकार निषेध करना ही प्रत्याख्यान है। 'यह कार्य आपने अपने अनुरूप नहीं किया' इस प्रकार का वचन उपालम्भ है। 'ऐसा मत करो' यह प्रतिषेध है। 'ऐसा करना चाहिये' इस प्रकार की प्रेरणा चोदना है। 'जो मैं हूँ वही आप हैं, जो मेरा धन है वही आपका भी है' इस प्रकार की तसल्ली देना सान्त्वना है। आपत्ति के समय सहायता करना अभ्युपपत्ति है। दोष देकर धमकी देना भर्त्सना है।

(३) अनुनय तीन प्रकार का होता है : १. अर्थकरणनिमित्तक, २. अतिक्रमणनिमित्तक और ३. पुरुषादिव्यसननिमित्तक। किसी आवश्यक कार्य को करने के लिए अनुनय किया जाना ही अर्थकरणनिमित्तक है, किसी कुपित पुरुष को शान्त करने के लिए अनुनय करना अतिक्रमणनिमित्तक है, और किसी आत्मीय की मृत्यु के कारण आई हुई विपत्ति में अनुनय करना पुरुषाधिव्यसननिमित्तक है। अनुनय कहते हैं अनुग्रह को।

(४) १. प्रज्ञापना, २. आज्ञा, ३. परिदान, ४. परीहार, ५. निसृष्टि ६. प्रवृत्तिक ७. प्रतिलेख और ८. सर्वत्रग, लेख के ये आठ भेद और हैं।