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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १३५

लिकुचो वकुलो वटश्च योनयः । पीतिका नागवृक्षिका , गोधूमवर्णा लैंकुची, श्वेता वाकुली, शेषा नवनीतवर्णा ।

(१) तासां सौवर्णकुड्यका श्रेष्ठा । तया कौशेयं चीनपट्टाश्च चीनभूमिजा व्याख्याताः ।

(२) माधुरमापरान्तकं कालिङ्गकं काशिकं वाङ्गकं वात्सकं माहिषकं च कार्पासिकं श्रेष्ठमिति ।

(३) अतः परेषां रत्नानां प्रमाणं मूल्यलक्षणम् ।
जातिं रूपं च जानीयान्निधानं नवकर्म च ॥
(४) पुराणप्रतिसंस्कारं कर्मगुह्यमुपस्करान् ।
देशकालपरीभोगं हिंस्राणां च प्रतिक्रियाम् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कोशप्रवेश्यरत्नपरीक्षा नाम एकादशोऽध्यायः, आदितः एकत्रिंशः ।

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होती है । नागकेसर के पेड़ से निकाली जाने वाली पत्रोर्णा पीली होती है । बड़हर पर गेहुँए रंग की होती है । मौलसरी की सफेद होती है । बरगद तथा अन्य वृक्षों की पत्रोर्णा मक्खन के रंग की होती है ।

( १ ) उनमें सुवर्णकुड्यक ( असम ) की पत्रोर्णा उत्तम समझी जाती है । इसी प्रकार दूसरे रेशम और चीन में उत्पन्न होने वाले चीनपट्ट में सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।

( २ ) मधुरा ( मदुरा ), अपरांतक ( कोंकण ), कलिंग, काशी, वंग, वत्स और महिषक ( मैसूर ), इन देशों में पैदा होने वाली कपास के कपड़े सर्वोत्तम समझे जाते हैं ।

( ३ ) कोषाध्यक्ष को चाहिए कि वह, मोती से लेकर कपास तक जिन रत्न, सार और फल्गु आदि पदार्थों का निरूपण किया गया है तथा जिनका निरूपण आगे किया जायगा, इसके अतिरिक्त रत्नों के प्रमाण, मूल्य, लक्षण, जाति, रूप, निधान और संस्कार-शुद्धि आदि विषयों के संबन्ध में विस्तार से जानकारी प्राप्त करे ।

( ४ ) पुराने रत्नों का पुनः संस्कार, उनको छीलना, उनका रंग बदलना, उनको साफ करना, देश-काल के अनुसार उनका उपयोग करना, कृमि-कीटों से उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध करना आदि कार्य भी कोषाध्यक्ष की जानकारी से सम्बद्ध हैं ।

अध्यक्षप्रचार नामक दूसरे अधिकरण में कोशप्रवेश्यरत्नपरीक्षा नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।

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