कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० २८ : अ० १२ ] खनिज सम्बन्धी कार्य १३७
(१) तत्प्रतिरूपकमुग्रगन्धरसं शिलाजतु विद्यात् । (२) पीतकास्ताम्रकास्ताम्रपीतका वा भूमिप्रस्तरधातवो भिन्ना नील-राजीमन्तो मुद्गमाषकृसरवर्णा वा दधिबिन्दुपिण्डचित्रा हरिद्राहरीतकी-पद्मपत्रशैवलयकृत्प्लीहानवद्यवर्णा भिन्ना श्लक्ष्णबालुकालेखाबिन्दुस्वस्तिक-वन्तः सगुलिका अर्चिष्मन्तस्तप्यमाना न भिद्यन्ते बहुफेनधूमाश्च सुवर्ण-धातवः प्रतीवापार्थास्ताम्ररूप्यवेधनाः । (३) शङ्खकर्पूरस्फटिकनवनीतकपोतपारावतविमलकमयूरग्रीवावर्णाः सस्यकगोमेदकगुडमत्स्यण्डिकावर्णाः कोविदारपद्मपाटलीकलायक्षौमातसी-पुष्पवर्णाः ससीसाः साञ्जनाः विस्रा भिन्ना श्वेताभाः कृष्णाः कृष्णाभाः श्वेताः सर्वे वा लेखाबिन्दुचित्रा मृदवो ध्मायमाना न स्फुटन्ति बहुफेन-धूमाश्च रूप्यधातवः । (४) सर्वधातूनां गौरववृद्धौ सत्त्ववृद्धिः । तेषामशुद्धा मूढगर्भा वा
बैठ जाय अथवा सौ पल ताँबा या चांदी उसके ऊपर डालकर यदि वह उसको एक पल जल सुनहरा बना दे तो समझना चाहिए कि इस जल-स्रोत के नीचे अवश्य ही सोने की खान है।
( १ ) यदि किसी स्थान पर उसी के समान केवल तेज गन्ध या उग्र रस की संभावना हो तो समझना चाहिए कि वहाँ पर शिलाजीत का उत्पत्तिस्थान है।
( २ ) पीले या ताँबे अथवा दोनों रङ्गों की मिट्टी और पत्थर जिनके तोड़ने पर बीच में नीली रेखायें या मूंग, उड़द, तिल आदि के समान या दही के छोटे-छोटे कणों के समान छोटी-छोटी बूंदों वाला, हल्दी, हरीतकी, कमलपत्र, सेवार, यकृत, प्लीहा तथा केसर के समान या तोड़ने पर बारीक रेत की रेखाओं, बूंदों, स्वस्तिक-चिह्नों, मोटे रेत के कणों के समान, कान्ति युक्त और तपाये जाने पर न फटने वाली तथा बहुत झाग एवं धुआं देने वाली सुवर्ण धातु होती है। इस प्रकार की मिट्टी और पत्थर से ताँबा तथा चाँदी को सोना बनाया जा सकता है।
( ३ ) शंख, कपूर, स्फटिक मणि, मक्खन, जङ्गली कबूतर, पालतू कबूतर, सफेद तथा लाल रङ्ग की मणि, मयूर ग्रीवा, नील मणि, गोरोचन, गुड़, शक्कर, कचनार, कमल, पाटली, मटर, अलसी आदि के समान रङ्ग वाले, सीसा, अंजन, दुर्गन्ध से युक्त, तोड़ने पर बाहर से सफेद मालूम होने वाले किन्तु भीतर तथा बाहर से काले और भीतर से सफेद प्रतीत होने वाले अथवा हर प्रकार की रेखाओं तथा बूंदों से युक्त, मृदु, तपाये जाने पर जो फटे नहीं किन्तु बहुत झाग और धुआं उगलें, इस प्रकार की धातु रूप्यधातु कही जाती हैं।
( ४ ) इन सभी धातुओं के सम्बन्ध में यह समझना चाहिए कि उनमें जितना