कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण २९ | ## अक्षशालायां सुवर्णाध्यक्षः |
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| अध्याय १३ |
(१) सुवर्णाध्यक्षः सुवर्णरजतकर्मान्तानामसम्बन्धावेशनचतुःशाला-मेकद्वारामक्षशालां कारयेत् । विशिखामध्ये सौवर्णिकं शिल्पवन्तमभिजातं प्रात्ययिकं च स्थापयेत् ।
(२) जाम्बूनदं शातकुम्भं हाटकं वैणवं शृङ्गिशुक्तिजं, जातरूपं रस-विद्धमाकरोद्गतं च सुवर्णम् ।
(३) किञ्जल्कवर्णं मृदु स्निग्धमनादि भ्राजिष्णु च श्रेष्ठं, रक्तपीतकं मध्यमं, रक्तमवरं श्रेष्ठानाम् ।
(४) पाण्डु श्वेतं चाप्राप्तकम् । तद्द्येनाप्राप्तकं तच्चतुर्गुणेन सीसेन
अक्षशाला में सुवर्णाध्यक्ष के कार्य
( १ ) सुवर्णाध्यक्ष को चाहिए कि वह सोने-चाँदी के प्रत्येक कार्य को करने के लिए एक अक्षशाला का निर्माण करवावे, उसमें एक ही प्रधान द्वार होना चाहिए, उसके चारों ओर, एक दूसरे से अलग, चार बड़े भवन होने चाहिए । विशिखा (सर्राफा बाजार) में चतुर, कुलीन, विश्वस्त और पारखी सर्राफों को बसाया जाय ।
( २ ) सोना पाँच प्रकार का होता है; उसके रङ्ग भी पाँच होते हैं : १. जाम्बू-नद ( मेरु पर्वत से निकलने वाली जम्बू नदी से उत्पन्न जामुनी रङ्ग का ), २. शात-कुम्भ ( शतकुम्भ पर्वत से उत्पन्न, कमलरज के समान ), ३. हाटक ( सोने की खान से उत्पन्न, सेवतीपुष्प की भाँति ), ४. वैणव ( वेणु पर्वत पर उत्पन्न कर्णिकारपुष्प की आकृति का ) और ५. शृंगिशुक्तिज ( स्वर्णभूमि में उत्पन्न, मैनसिल के रङ्ग का ) । सुवर्ण के तीन प्रकार : १. जातरूप ( स्वयं शुद्ध ), २. रसविद्ध ( रसायन क्रियाओं द्वारा निर्मित ) और ३. आकारोद्गत (अशुद्ध, खानों से निकाला हुआ) ।
( ३ ) कमलरज की आकृति का, मृदु, स्निग्ध, शब्दरहित और चमकदार सोना सर्वोत्तम; लाल-पीत वर्ण मिश्रित सोना मध्यम; और केवल लाल वर्ण का निकृष्ट होता है ।
( ४ ) उत्तम कोटि के सुवर्ण में से जिसमें कुछ पीलाई एवं सफेदी हो वह अप्राप्तक कहलाता है । उस सोने में जितना मैल मिला हो, उससे चौगुना सीसा डालकर उसे शुद्ध करना चाहिए । सीसा मिला देने से यदि वह फटने लगे तो उसे