कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्रकरण ७० अध्याय १४
कर्मकरकल्पः, सम्भूयसमुत्थानम्
(१) गृहीत्वा वेतनं कर्म अकुर्वतो भृतकस्य द्वादशपणो दण्डः । संरोधश्चाकारणात् । (२) अशक्तः कुत्सिते कर्मणि व्याधौ व्यसने वा अनुशयं लभेत, परेण वा कारयितुम् । तस्य व्ययकर्मणा लभेत, भर्ता वा कारयितुम् । (३) नान्यस्त्वया कारयितव्यो मया वा नान्यस्य कर्तव्यमित्यवरोधे भर्तुरकारयतो भृतकस्याकुर्वतो वा द्वादशपणो दण्डः । कर्मनिष्ठापने भर्तुरन्यत्र गृहीतवेतनो नासकामः कुर्यात् । (४) उपस्थितमकारयतः कृतमेव विद्यादित्याचार्याः । (५) नेति कौटिल्यः । कृतस्य वेतनं, नाकृतस्यास्ति । स चेदल्पमपि कारयित्वा न कारयेत्, कृतमेवास्य विद्यात् । देशकालातिपातनेन कर्मणा-
मजदूरी के नियम और साझेदारी का हिस्सा
(१) वेतन लेकर जो नौकर कार्य न करे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि अकारण ही वह कार्य न करे तो उसे कारावास में बन्द कर दिया जाय ।
(२) किसी अशक्त, कुत्सित कार्य के आ जाने पर, बीमारी में या किसी आपत्ति में फँस जाने के कारण नौकर आकस्मिक छुट्टी (अनुशय) ले सकता है; अथवा अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को रखकर छुट्टी ले सकता है। स्थानापन्न नौकर की मजदूरी उसके कार्य से ही पूरी की जाय अथवा मालिक ही किसी दूसरे से कार्य ले ।
(३) 'न तो आप किसी से कार्य करवायेंगे और न मैं ही किसी का कार्य करूँगा' इस प्रकार के आपसी समझौते को यदि मालिक भंग करे तो बारह पण दण्ड और यदि नौकर भंग करे तो भी बारह पण दण्ड दिया जाय । यदि किसी मजदूर ने दूसरी जगहों से अग्रिम वेतन ले लिया हो, तो पहिले मालिक का कार्य पूरा करने पर ही, वह दूसरी जगह जा सकता है ।
(४) कुछ आचार्यों का अभिमत है कि हाजिर हुआ मजदूर यदि कुछ कार्य न भी करे तो हाजिरी मात्र से ही उसका कार्य समझ लिया जाय ।
(५) परन्तु आचार्य कौटिल्य ऐसा नहीं मानते हैं। उनका कथन है कि वेतन कार्य करने का दिया जाता है, खाली बैठने का नहीं। यदि मालिक थोड़ा ही काम