कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
DevanagariSanskritpublished918 pages
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३२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) दाता प्रतिग्रहीता च स्यातां नोपहतौ यथा। दाने क्रये वानुशयं तथा कुर्युः सभासदः॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे विक्रीतक्रीतानुशयो नाम पंचदशोऽध्यायः; आदित एकसप्ततितमः।
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( १ ) धर्मस्थ ( सभासद ) लोगों को चाहिए कि वे लेन-देन और क्रय विक्रय के अनुशय में ऐसी व्यवस्था करें कि किसी को कोई नुकसान न उठाना पड़े ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में क्रीतविक्रीतानुशय नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।
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