कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ७४-७५ | # द्यूतसमाह्वयम्, प्रकीर्णकानि |
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| अध्याय २० |
(१) द्यूताध्यक्षो द्यूतमेकमुखं कारयेत्। अन्यत्र दीव्यतो द्वादशपणो दण्डः गूढाजीविज्ञापनाथँम्।
(२) द्यूताभियोगे जेतुः पूर्वः साहसदण्डः। पराजितस्य मध्यमः। बालिशजातीयो ह्येष जेतुकामः पराजयं न क्षमत इत्याचार्याः। नेति कौटल्यः। पराजितश्चेद्द्विगुणदण्डः क्रियेत न कश्चन राजानमभिसरिष्यति। प्रायशो हि कितवाः कूटदेविनः।
(३) तेषामध्यक्षाः शुद्धाः काकणीरक्षांश्च स्थापयेयुः।
(४) काकण्यक्षाणामन्योपधाने द्वादशपणो दण्डः। कूटकर्मणि पूर्वः साहसदण्डः, जितप्रत्यादानम्। उपधौ स्तेयदण्डश्च।
द्यूत समाह्वय और प्रकीर्णक
( १ ) द्यूत समाह्वय : द्यूताध्यक्ष का चाहिए कि वह किसी एक नियत स्थान में जुआ खेलने का प्रबन्ध करे। उस नियत स्थान को छोड़कर दूसरी जगह जुआ खेलने वाले पर बारह पण दण्ड किया जाय; ऐसा इसलिए किया गया है कि जिससे ठगी, धोखेबाज लोगों का पता लग सके।
( २ ) 'जुए के मुकदमों में जीतने वाले को प्रथम साहस दण्ड; और हारने वाले को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय; क्योंकि हारने वाला मूर्ख जीतने की इच्छा से जुआ खेलता है और हार जाने पर अपनी हार को सहन न कर जीतने वाले से झगड़ा कर बैठता है।' ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है। परन्तु आचार्य कौटिल्य इस बात को नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि 'यदि हारने वाले को जीतने वाले से दुगुना दण्ड दिया जायगा तो फिर कोई भी हारने वाला जुआरी अदालत की शरण में न जा सकेगा; और उसका नतीजा यह होगा कि धूर्त लोग कपट से जुआ खेलते रहेंगे।'
( ३ ) द्यूताध्यक्षों को चाहिए कि वे जुआघर में साफ कौड़ी और पाँसे रखवा दें।
( ४ ) यदि कोई जुआरी उन कौड़ियों और पाँसों को बदले तो उसपर बारह पण दण्ड दिया जाय। यदि कोई छल-कपट से जुआ खेले तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय और उसके जीते हुए धन को छीन लिया जाय तथा रखवाये गए पाँसों में कुछ तब्दीली करके दूसरे को धोखा देने के अभियोग में चोरी का दण्ड दिया जाय।