कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context३६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
मदेशकालविक्रेतारं जातवैराशयं हीनकर्मजातिं विगूह्यमानरूपं लिङ्गेना- लिङ्गिनं लिङ्गिनं वा भिन्नाचारं पूर्वकृतापदानं स्वकर्मभिरपदिष्टं नागरिक- महामात्रदर्शने गूहमानमपसरन्तमनुच्छ्वासोपवेशिनमाविग्नं शुष्कभिन्न- स्वरमुखवर्णं शस्त्रहस्तमनुष्यसम्पातत्रासिनं हिंस्रस्तेननिधिनिक्षेपापहारवर- प्रयोगगूढाजीविनामन्यतमं शङ्केतेति शङ्काभिग्रहः । (१) रूपाभिग्रहस्तु । नष्टापहृतमविद्यमानं तज्जातव्यवहारिषु निवेद- येत् । तच्चेन्न्निवेदितमासाद्यप्रच्छादयेयुः, साचिव्यकरदोषमाप्नुयुः । अजा- नन्तोऽस्य द्रव्यस्यातिसर्गेण मुच्येयन् । न चानिवेद्य संस्थाध्यक्षस्य पुराण- भाण्डानामाधानं विक्रयं वा कुर्युः । (२) तच्चेन्न्निवेदितमासाद्येत, रूपाभिगृहीतमागमं पृच्छेत्—कुतस्ते
में चुपके-चुपके चलते हों; जो गहने आदि की शक्ल को बिगाड़ कर उनकी अनुचित विक्री करते हों; शत्रुता रखने वाले; नीचकर्म करने वाले; नीच जाति में उत्पन्न; अपनी असली सूरत को छिपा कर रखने वाले; जो ब्रह्मचारी आदि न होकर भी ब्रह्मचारियों के वेश में रहते हुए भी नियमों का ठीक-ठीक पालन न करते हों; जिन पर पहिले चोरी का अभियोग लग चुका हो, जो अपने बुरे कर्मों के लिए प्रसिद्ध हों; जो नगर के पहरेदारों तथा अन्य राजकीय कर्मचारियों से छिपें तथा भाग जाँय; जो छिपकर एकान्त में बैठते हों; भयभीत, सूखे मुँह, मुरझाये चेहरे, और भर्राई आवाज वाले; हाथ में हथियार लेकर चलने वाले पुरुष से डर जाने वाले; इत्यादि पुरुषों पर यह शंका की जा सकती है, या तो वह हत्यारा है, या चोर है, या डाकू है, या क्रोधावेश में उसने किसी के ऊपर हथियार चलाया है अथवा वह प्रजा को कष्ट देने वाला प्रजाकण्टक है । यह शंकित पुरुषों की पहिचान का निरूपण किया गया ।
( १ ) चोरी के माल की पहिचान : यदि असावधानी के कारण कोई चीज खो जाय या चोरी चली जाय और खोजने पर जल्दी न मिले तो उस चीज की पूरी हुलिया लिखकर उसी चीज के व्यापारी के यहाँ भेज दी जाय कि इस प्रकार की चीज उसके यहाँ बिकने को आवे तो वह ध्यान रखे । यदि ऐसी वस्तुओं के आ जाने पर भी व्यापारी उसकी सूचना हुलिया देने वाले को न पहुँचाये तो उन्हें वही दण्ड दिया जाय, जो चोरी में सहायता देने वाले व्यक्ति को दिया जाता है । यदि उन्हें इस बात का पता न हो तो उस वस्तु के वापिस कर देने पर उन्हें अपराध से बरी किया जाय । संस्थाध्यक्ष को सूचित किए बिना कोई भी माल न तो गिरबी रखा जाय और न बेचा जाय ।
( २ ) यदि कोई खोई हुई वस्तु किसी व्यापारी के यहाँ आ जाय तो उस वस्तु के लाने वाले व्यक्ति से पूछा जाय 'तुम्हें यह वस्तु कहाँ से मिली है ?' यदि वह कहे