कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ८२ : अ० ७ ] आशुमृतक की परीक्षा ३७५
( १ ) रज्जुशस्त्रविषैर्वापि कामक्रोधवशेन यः । घातयेत्स्वयमात्मानं स्त्री वा पापेन मोहिता ॥ रज्जुना राजमार्गे तां चण्डालेनापकर्षयेत् । न श्मशानविधिस्तेषां न सम्बन्धक्रियास्तथा ॥ ( २ ) बन्धुस्तेषां तु यः कुर्यात्प्रेतकार्यक्रियाविधिम् । तद्गतिं स चरेत्पश्चात्स्वजनाद्वा प्रमुच्यते ॥ ( ३ ) संवत्सरेण पतति पतितेन समाचरन् । याजनाध्यापनाद्यौनात्तैश्चान्योऽपि समाचरन् ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे आशुमृतकपरीक्षा नाम सप्तमोऽध्यायः, आदितस्त्र्यशीतितमः ।
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( १ ) जो व्यक्ति काम या क्रोध के वशीभूत होकर, फांसी लगाकर या अस्त्र द्वारा आत्महत्या करे और इसी प्रकार जो स्त्री दुराचार के कारण आत्महत्या करे, चाण्डाल उनकी लाशें रस्सी से बाँधकर बाजार में घसीटता हुआ ले जाय । ऐसे व्यक्तियों के लिए दाहादि संस्कार एवं तिलांजलि आदि संस्कार वर्जित हैं ।
( २ ) ऐसे व्यक्तियों का जो कोई भी भाई-बन्धु उनका दाहादि संस्कार करता हैं, मरने के बाद उसको भी वही गति प्राप्त होती है और जीवितावस्था में उसे जातिच्युत कर दिया जाता है ।
( ३ ) पतित पुरुषों के साथ जो भी व्यक्ति भजन, अध्यापन और विवाह आदि करता है वह भी एक वर्ष के भीतर पतित हो जाता है, और फिर उसके साथ व्यवहार करने वाले लोग भी एक वर्ष में पतित हो जाते हैं ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में आशुमृतकपरीक्षा नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।
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