कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context४१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पांचवां अधिकरण
सूत्रवस्त्रताम्रवृत्तकंसगन्धभैषज्यशीधुपण्याश्चत्वारिंशत्कराः । धान्यरसलोहपण्याः शकटव्यवहारिणश्च त्रिंशत्कराः । काचव्यवहारिणो महाकारवश्च विंशतिकराः । क्षुद्रकारवो बन्धकीपोषकाश्च दशकराः । काष्ठवेणुपाषाणमृद्भाण्डपक्वान्नहरितपण्याः पञ्चकराः । (१) कुशीलवा रूपाजीवाश्च वेतनार्धं दद्युः । (२) हिरण्यकरभकर्मण्यानाहारयेयुः । न चैषां कञ्चिदपराधं परिहरेयुः ते ह्यपरगृहीतमभानीय विक्रीणीरन् । (३) इति व्यवहारिषु प्रणयः । (४) कुक्कुटसूकरमर्धं दद्यात् । क्षुद्रपशवः षड्भागम् । गोमहिषाश्वतरखरोष्ट्राश्च दशभागम् । बन्धकीपोषका राजप्रेष्याभिः परमरूपयौवनाभिः कोशं संहरेयुः । (५) इति योनिपोषकेषु प्रणयः ।
आदि व्यापारिक वस्तुओं पर उनकी लागत का पचासवाँ हिस्सा टैक्स लिया जाय । इसी प्रकार सूत, कपड़ा; ताँबा, पीतल, काँसा, गन्ध, जड़ी-बूटी और शराब पर चालीसवाँ हिस्सा, गेहूं, धान आदि अन्न, तेल, घी, लोहा और बैलगाड़ियों पर तीसवाँ हिस्सा, काँच के व्यापारी तथा बड़े-बड़े कारीगरों पर बीसवाँ हिस्सा छोटे-छोटे कारीगरों तथा कुलटा स्त्रियों को घर में रखने वालों से दसवाँ हिस्सा, और लकड़ी, बांस, पत्थर, मिट्टी के वर्तन, पकवान तथा हरे शाक आदि पर पांचवाँ हिस्सा सरकारी टैक्स लिया जाय ।
(१) नट, नर्तक, गायक तथा वेश्यायें अपनी कमाई का आधा हिस्सा राजकर दें ।
(२) व्यापारियों से प्रति पुरुष के हिसाब से कुछ नकदी कर रूप में ली जाय और इस भय से व्यापार छोड़ देने पर भी उसका कर वसूला जाय । क्योंकि ऐसे लोगों से यह भी सम्भव हो सकता है कि वे अपनी वस्तु को दूसरे की कहकर बेचें, जिससे कि टैक्स से बच जाँय ।
(३) यहाँ तक व्यापारियों से राज्यकर लेने के सम्बन्ध में कहा गया ।
(४) मुर्गे और सूअर पालने वाले, उनकी आमद का आधा हिस्सा टैक्स दें । इसी प्रकार भेड़-बकरी पालने वाले छठा हिस्सा, गाय, भैंसे, खच्चर, गधा तथा ऊँट पालने वाले दसवाँ हिस्सा राजकर दें । वेश्याओं के जमादारों को चाहिए कि वे राज-अनुमत रूपवती वेश्याओं द्वारा राजकोष के लिए धन जमा करें ।
(५) यहाँ तक जानवर पालने वालों से राज्यकर लेने के सम्बन्ध में कहाँ गया ।