BharatKosha
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 624 of 918

Read in context
Page 624
५४०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवां अधिकरण

(१) बह्वेकपुत्रयोर्बहुपुत्र एकं दत्त्वा शेषवृत्तितस्तब्धः सन्धिमतिक्रामति नेतरः। (२) पुत्रसर्वस्वदाने सन्धिश्चेत्पुत्रफलतो विशेषः। समफलयोः शक्तप्रजननतो विशेषः। शक्तप्रजननयोरप्युपस्थितप्रजननतो विशेषः। (३) शक्तिमत्येकपुत्रे तु लुप्तपुत्रोत्पत्तिरात्मानमादध्यात्, न चैकपुत्रमिति। (४) अभ्युच्चीयमानः समाधिमोक्षं कारयेत्। (५) कुमारासन्नाः सत्रिणः कारुशिल्पिव्यञ्जनाः कर्माणि कुर्वाणाः सुरुङ्गया रात्रावुपखानयित्वा कुमारमपहरेयुः। नटनर्तकगायनवादकवाग्जीवनकुशीलवप्लवकसौभिका वा पूर्वप्रणिहिताः परमुपतिष्ठेरन्। ते कुमारं


शूरपुत्र केवल पराक्रम के कार्यों को ही कर सकता है। शूरतारहित, किन्तु शस्त्रास्त्र-निपुण पुत्र अपने लक्ष्य को अच्छी तरह भेदन करने की क्षमता रखता है। इन दोनों में से लक्ष्य को ठीक भेदन करने वाले पराक्रमहीन पुत्र की अपेक्षा पराक्रमी पुत्र ही श्रेष्ठ है, क्योंकि अपनी सतर्कबुद्धि से वह कृतास्त्र को भी अपने वश में कर लेता है।

( १ ) एक पुत्र और अनेक पुत्रों में से अनेक पुत्रों का होना अच्छा है, क्योंकि एक पुत्र को संधि में दिये जाने पर भी बाकी पुत्रों के द्वारा राजा यथावसर संधि को भी तोड़ सकता है; किन्तु जिसका एक ही पुत्र है वह ऐसा नहीं कर सकता है।

( २ ) यदि संधि करने वाले दोनों राजाओं का एक-एक ही पुत्र हो और उनके देने पर ही संधि दृढ़ होती हो तो; उन दोनों में से वही अधिक लाभ में रहता है, जिसके पुत्र का भी पुत्र हो गया हो; क्योंकि पुत्र के अभाव में पौत्र भी सिंहासन पर बैठ सकता है। यदि संधि करने वाले दोनों राजाओं के पुत्र-पौत्र हों तो उनमें से वही अधिक लाभ में है, जिसका पुत्र अभी युवा है। यदि दोनों के पुत्र युवा हों, तो उनमें से उसी को ही अधिक लाभ है, जिसका पुत्र निकट भविष्य में बच्चा पैदा करने की स्थिति में है। निष्कर्ष यह है यथाशक्ति पुत्र न देने का यत्न करना चाहिए।

( ३ ) पुत्र पैदा करने की अथवा राज्यभार को सँभालने की शक्ति रखने वाले यदि एक ही पुत्र का पुत्र हो और उसकी पुत्रोत्पादन की शक्ति जाती रही हो तो अपने ही आप को राजा, संधि पर चढ़ा दे; किन्तु इकलौते पुत्र को कदापि न दे। यहाँ तक संधि को दृढ़ करने के उपायों का निरूपण किया गया।

( ४ ) संधि हो जाने के बाद यदि अपनी शक्ति बढ़ जाय तो दूसरे राजा के यहाँ बंधक में रखे हुए पुत्र को मुक्त करा देना चाहिए।

( ५ ) बन्धक में रखे गए राजपुत्र को छुड़ाने के लिए इन उपायों को काम में लाया जाय : राजपुत्र के निकट गुप्त वेश में रहने वाले बढ़ई, लुहार, सुनार या मिस्त्री तथा अन्य लोग, अपने जिम्मे के कार्यों को करते हुए राजपुत्र के निवास के पास ही एक सुरंग खोदकर रात्रि में वहाँ से उसको लेकर वे भाग जायें। अथवा