केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context५८ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म | अनन्तर चौथी बार कहनेपर पहली | ही बार कहे हुए ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकस्माद् | किया । लोकमें भी एक ही गुरु- | से श्रवण करनेवालोंमें कोई तो गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रति- | ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई पद्यते कश्चिदद्यथावत् कश्चिद्विप- | ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा | समझ बैठता है और कोई समझता रींतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु | ही नहीं । फिर यदि अतीन्द्रिय | आत्मतत्त्वको न समझ सकें तो वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम् ? | इसमें कहना ही क्या है ? इसके | सम्बन्धमें तो समस्त सद्वादी और अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादि- | असद्वादी तार्किक भी उलटा ही | समझे हुए हैं । अतः 'ब्रह्मको जान मस्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं | लिया' यह कथन सुनिश्चित होनेपर | भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होनेके ब्रह्मेति सुनिश्चितोक्तमपि विषम- | कारण आचार्यका 'यदि मन्यसे | सुवेद' इत्यादि शंकायुक्त कथन प्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे | उचित ही है । [अतः आचार्य इत्यादि साशङ्कं वचनं युक्तमेव | कहते हैं यदि तू 'ब्रह्मको मैने जान | लिया है' ऐसा मानता है तो] आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि | निश्चय ही तू ब्रह्मके अल्प रूपको नूनं त्वं वेत्थ जानीषे ब्रह्मणो | ही जानता है । रूपम् । | वाक्य-भाष्य देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः | उद्देश्यको लेकर आचार्य कहते हैं—] | देवताओंमें भी जो कोई यह मानता है सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव | कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ | वह भी निश्चय ही उस ब्रह्मके रूपको वेत्ति नूनम् । कस्मात् ? अविषय- | बहुत कम जानता है। क्यों ? क्योंकि ब्रह्म त्वात्कस्यचिद्ब्रह्मणः । | किसीका भी विषय नहीं है ।