खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in contextपरिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०६ न च वाच्यं प्रत्यभिज्ञानं व्यवच्छेद्यं मा भूत्, स्मृत्यन्तरन्तु भविष्यतीति । तस्याप्यनुभूतित्वेन भवताऽवश्यं स्वीकर्तव्यत्वात् । तथा हि—'घटस्तत्रासीदि'त्या- दिस्मृतौ पूर्वकालविशिष्टो घटः स्फुरति । न चासौ पूर्वमनुभूता भूतता, या संस्कारेणोपनीयेत । प्रत्युत पूर्वं वर्तमानतया एवानुभूत्या ग्रहणम् । तस्मादिदानीं पूर्वताधीसामग्रीसम्भेदात् सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञानवद्विशिष्टावगमोऽप्यसौ स्मृत्य- नुभवात्मक एवाभ्युपगन्तव्यः । एतेन — अनुभवसामग्रीसहितः संस्कारोऽनुभवकारणमिति पक्षे पूर्वं शङ्कित इदमपि दूषणं द्रष्टव्यम् । तथा सति स्मृत्युच्छेदापत्तेः । न च तदस्ति स्मरणं यत्र सा न प्रकाशते, ततश्च व्यवच्छेद्यानुपपत्तिः । यदपि कैश्चिदुच्यते दोषवशात् प्रमुष्टतत्तांशस्मरणं भवतीति । तदपि नोपपन्नम्; तदीयस्मरणत्वे प्रमाणाभावात् । न चानुभवसामग्र्यभावात् परिशेष्येण स्मृतित्वम् ; समर्थनकर्ता — उक्त-लक्षण में 'अनुभूति' पद का व्यवच्छेद्य प्रत्यभिज्ञा नहीं, किन्तु शुद्ध स्मृति है । खंडनकर्ता—आप शुद्ध स्मृति को भी अनुभव अवश्य मानेंगे । देखिये, 'घटस्तत्राऽऽसीत्' इस स्मृति में पूर्वकाल से युक्त घट भासता है । वह भूतता ( तत्ता ) पूर्वकाल में अनुभूत न होने से संस्कार द्वारा उपनीत नहीं हो सकती । किन्तु पूर्वकाल में वर्तमानता ही अनुभूत है । तस्मात् इस काल में भूतता की प्रत्यक्षसामग्री का मिश्रण होने से 'सोऽयम्' इस प्रत्यभिज्ञा के तुल्य 'घटस्तत्राऽऽसीत्' यह भी ज्ञान स्मृति और अनुभव उभयरूप ही मानना होगा । 'अनुभवसामग्री से युक्त संस्कार अनुभव का कारण है', इस पूर्वकथन में यह भी दोष है कि ऐसा मानने पर स्मृति का उच्छेद हो जायगा, क्योंकि ऐसा कोई स्मरण नहीं, जिसमें भूतता ( तत्ता ) भासती न हो । इस तरह जब स्मृतिमात्र भूतता- अंश में मानस अनुभवरूप है, तो 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में 'अनुभूति' पद के व्यवच्छेद्य का उच्छेद जानना चाहिए । समर्थन—'इदं रजतम्' इस स्थल में दो ज्ञान हैं—'इदम्' यह अंश तो प्रत्यक्ष है और 'रजतम्' यह अंश स्मरण । यद्यपि दोनों ज्ञानों में परस्पर भेद है, परन्तु दोष से भेद का अग्रह है । साथ ही यद्यपि अन्यत्र तत्ता से युक्त का ही स्मरण होता है, १. यद्यपि 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' यह लक्षण अन्यथाख्यातिवादी नैयायिक का है। अतः मीमांसाभिमत अख्यातिवाद के अनुसार उसका पद-कृत्य अयुक्त है; तथापि प्रसङ्गतः अख्याति- वाद के खण्डन के लिए यह कथन है ।