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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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नरेश बताते हैं; पर श्रीहर्ष बंगाली नहीं, यह पीछे सिद्ध किया ही जा चुका है। ६.गौडो- र्वीश-कुलप्रशस्ति : रघुवंश आदि की तरह इसमें भी गौडदेशीय राजवंश का वर्णन है। ७. ईश्वराभिसन्धि : यह ईश्वर की सत्ता का साधन करनेवाला ग्रन्थ होगा। फलतः अनी- श्वरमतवादी बौद्धों के खण्डनार्थ यह बनाया गया होगा। जहाँ अन्य भी 'अभिसन्धियों' के नाम दीख पड़ते हैं, वे कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं, प्रत्युत इसी ईश्वराभिसन्धि के प्रकरण हैं। ८. स्थैर्य-विचारण प्रकरण : यह बौद्धाभिमत क्षणिकत्व सिद्धान्त को खण्डन कर- वाला ग्रन्थ दीखता है। ६. नैषधीय-चरित : यह आज उपलब्ध है। इसमें नल-दमयन्ती की कथा वर्णित है और संस्कृत के पाँच महाकाव्यों में यह मुकुटमणि माना जाता है। १०. खण्डन-खण्ड-खाद्य : यह तो प्रस्तुत ग्रन्थ ही है। अब प्रश्न उठता है कि इन ग्रन्थों की रचना में पौर्वापर्य का क्रम क्या है ? शेष आठ ग्रन्थों के अनुपलब्ध होने से इस सम्बन्ध में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। फिर भी स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्रीराममिश्र शास्त्री मानते हैं कि 'खण्डन-खण्ड-खाद्य' 'ईश्वराभिसन्धि' के पूर्व और शेष ग्रन्थ उसके बाद रचे गये। किन्तु खण्डन में ही 'शेषञ्च ईश्वराभिसन्धौ स्वप्रकाशवादे निर्वक्ष्यामः' और 'अवोचाम च जल्पे' (श्रीशंकर मिश्र के अनुसार इस वाक्य में 'ईश्वराभिसन्धौ' यह अध्याहृत है) इस प्रकार वर्तमान और अतीत दोनों कालों का 'ईश्वराभिसन्धि' के लिए खण्डन में प्रयोग मिलता है। अतः खण्डन के भाषानुवादकार स्वर्गीय श्रीचण्डीप्रसाद सुकुलजी दोनों का समकालिक निर्माण मानते हैं। स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्रीभागवताचार्य लिखते हैं कि "नैषध में 'खण्डन-खण्डतोऽपि सहजात्' (षष्ठसर्गान्त) और खण्डन में 'तथाऽहमकथयं नैषध- चरितस्य परमपुरुषस्तुतौ सर्गे' इस प्रकार दोनों का एक दूसरे में उल्लेख होने से दोनों ग्रन्थ एक ही समय में रचे गये हों, ऐसा हमें लगता है। हमारे मित्र और खण्डन- रूप रत्नाकर के मन्दराचल स्वर्गीय श्रीमोहनलाल उदासीन कहते हैं कि वैदुष्य की परम परिपाकावस्था में ही खण्डन की रचना माननी चाहिए।¹ हमें यही अन्तिम मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। इस दृष्टि से आरंभ में 'ईश्वरा'- भिसन्धि' को छोड़ शेष सात ग्रन्थ, फिर 'नैषध' और सबसे अन्त में 'खण्डन-खण्डखाद्य' और 'ईश्वराभिसन्धि' का रचना-क्रम मानना अनुचित न होगा। विद्वत्ता के साथ अवस्था के परिपाक से भी अद्वैत-भावना का चरम उत्कर्ष करनेवाले खण्डन जैसे ग्रन्थ का ही मेल बैठता है। खण्डन-खण्ड-खाद्य बहिरङ्ग-परीक्षण के बाद अब प्रस्तुत ग्रन्थ का संक्षिप्त अन्तरङ्ग-परीक्षण भी कर लेना उचित होगा। इस ग्रन्थ का 'खण्डन-खण्ड-खाद्य' नाम तो प्रसिद्ध है ही, 'अनिर्वचनी- १. श्रीभागवताचार्य : खण्डन-भूमिका । २. वही ।