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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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१२४. सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम स्यादेतत्—स्मृतित्वस्य अन्योन्याभावमादाय याऽतिप्रसक्तिर्दर्शिता सा नोपपद्यते, भेदाभेदवादिमते स्मृतित्वभेदाभेदस्य स्मृत्या सहाभ्युपगमात्। ययोर्भेदा- भेदः, तयोस्तत्रान्योन्याभावानभ्युपगमात् । मैवम् ; कथं ह्यवधार्यं स्मृतित्वस्य भेदाभेदः स्मृत्या, नानुभूत्येति ? अनुभूत्या सह तद्विशिष्टप्रमाया अभावादिति चेन्न । किं सत्याः किमसत्या इत्याद्युक्तविकल्पदोषात् । प्रागभावप्रतियोगिन्या इति चेन्न । अनुभूतौ तादृश्याः स्वीकारेण अनुभूते- स्तथात्वापातात् । समर्थन—स्मृतित्व का अन्योन्याभाव ग्रहणकर स्मृति में अनुभूति-लक्षण की जो अतिव्याप्ति दी गयी है, वह उपपन्न नहीं हो सकती; क्योंकि धर्म का धर्मी के साथ भेदाभेद होता है । स्मृतित्व का स्मृति में भेदाभेद है। जिसमें जिसका भेदाभेद हो, उसका उसमें अन्योन्याभाव नहीं रहता । खंडन—स्मृतित्व का स्मृति के साथ ही भेदाभेद है, अनुभूति से नहीं, यह बात आपने कैसे जान ली ? समर्थन—'स्मृतित्वविशिष्टा अनुभूतिः' इत्याकारक प्रमा नहीं होती, अतः जाना जाता है कि स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में नहीं है। खंडन—क्या आप विद्यमान स्मृतित्ववैशिष्ट्य-प्रमा के अभाव से अनुभूति में स्मृतित्व का अभाव सिद्ध करते हैं या अविद्यमान ? यदि कहें कि विद्यमान प्रमा के अभाव से, तो विद्यमान प्रमा के कारणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा। यदि कहें कि उक्तकारक प्रमा अविद्यमान है, तो प्रतियोगी के असत् होने से उसका अभाव भी असत् होगा, अतः बाधक का अभाव होने से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । समर्थन—अनुभूति में स्मृतित्ववैशिष्ट्य-प्रमा प्रागभाव की प्रतियोगिनी नहीं होती और स्मृति में होती है । अतः उक्त अभाव से अनुभूति में स्मृतित्वाभाव का निश्चय हो जायगा । खंडन—यदि उक्त वाक्य का यह अर्थ हो कि 'प्रागभावप्रतियोगी जो स्मृतित्व-प्रमा उसका अभाव', तो उक्त प्रमा में प्रागभाव की प्रतियोगिता सिद्ध हुई । फिर 'जो प्रागभाव का प्रतियोगी होता है, वह कदाचित् अवश्य उत्पन्न होता है' इस नियम के अनुसार उक्त प्रमा में सत्त्व होगा, जिससे उसके कारणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । यदि उक्त वाक्य का यह अर्थ करें कि 'अनुभूति में स्मृतित्व-प्रमा प्रागभाव की प्रतियोगी नहीं है', तो उक्त प्रमा में प्रागभाव-