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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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१३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य षेधप्रतिषेद्ध्यविरोघे हि प्रकारविशेषव्यवस्थानिरुक्त्यशक्तेरविशेषेण एकनिषेधे अ- यविधिध्रौव्यं भवदन्योन्याभावनिषेधेऽप्यन्योन्यविधये स्यात् । मम चानिर्वचनीयतैव प्रतीतिव्यवहारव्यवस्थापर्यंनुयोगत्राणवारणाय वज्र- वारवाणायमाना विजयते । मम त्वेवं दर्शनम् —प्रतीतिसिद्धत्वादत्यन्तासद्वि- लक्षणं भवदपि जगत्तथा सत्तोपगमेऽपि बाध्यमानत्वादनिर्वचनीयमिति । अत एव प्रतीयमानत्वाद् वैचित्र्यमनयोर्घुष्यमाणमतिदूरनिरस्तम् । उक्तप्रति- योग्यादिवैचित्र्यानुपपत्तितः प्रतीयमानस्यैव बाध्यताया एव कथनात् । तस्मात्— 'अन्योन्याभावसंसर्गाभावभेदव्यवस्थितौ । सत्यां स्याद्व्यवस्थेति स्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥ ३१ ॥' है । अन्योन्याभावस्थल में अभाव और प्रतियोगी एक अधिकरण में रहने से उनमें विरोध नहीं है, अतः उस स्थल में अभावाभाव प्रतियोगिरूप नहीं होगा । खंडन— 'अत्यन्ताभावस्थल में अभावाभाव प्रतियोगिरूप होता है, अन्योन्याभावस्थल में नहीं' यह व्यवस्था भी इन अभावों के निर्वचन के बिना हो नहीं सकती । यदि अविशेष रूप से अभावस्थल में उक्त नियम मानेंगे, तो अन्योन्याभाव का अभाव भी अन्योन्यरूप हो जायगा । प्रश्न — लक्षण द्वारा इन दोनों अभावों का भेद करना तो आपका भी कर्तव्य है, अन्यथा आप भी प्रतीति और व्यवहार के वैचित्र्य की व्यवस्था कैसे करेंगे ? खण्डन— मेरे मत में इस प्रश्नरूप बाण के बचाव के लिए अनिर्वचनीयता ही युद्ध-कवच है । अर्थात् जगत् प्रतीतिसिद्ध होने से अत्यन्त असत् नहीं है और निर्वचन योग्य न होने से बाधित प्रतीति का विषय होने के कारण सत् भी नहीं हैं, किन्तु अनिर्वचनीय है । इसलिए मुझसे निर्वचन का प्रश्न हो ही नहीं सकता । प्रतीति के बाधित होने के कारण से ही 'प्रतीति के वैलक्षण्य से दोनों अभावों में वैलक्षण्य है' यह कथन भी खण्डित हो जाता है । उक्त रीति से प्रतियोगी, अधिकरण और लक्षण तीनों में भेद न होने से दोनों अभावों में परस्पर भेद नहीं है । अतः विषय के बाध से प्रतीति बाधित है । तस्मात् अन्योन्याभाव और संसर्गाभाव का भेद सिद्ध होने पर अन्योन्याभाव- भिन्नत्वघटित संसर्गाभाव का लक्षण हो सकेगा और लक्षण होने पर ही अभावों में भेद सिद्ध होगा—इस तरह संसर्गाभाव के लक्षण में संसर्गाभाव का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। अथवा विषय के वैलक्षण्य से प्रतीति का वैलक्षण्य होता है और प्रतीति के वैलक्षण्य से