खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in context१४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम सापेक्षज्ञानं स्मृतिः, सापेक्षता च स्वविषयनियमे समानविषयज्ञानापेक्षतेति चेन्न । प्रत्यभिज्ञायास्तत्ताभागस्य स्मृतित्वापत्तेः । एवमस्त्विति चेन्न । तर्हि प्रत्य- भिज्ञायां स्मृत्यनुभवभागयोर्भिन्नविषयत्वव्यवस्थितौ तद्भेदः केन गृह्येतेति पूर्व- दोष आवर्तते । संस्कारमात्रजं ज्ञानं स्मृतिरित्यपि न । सामग्रीतः सर्वसम्भवेन लक्षणस्यास- म्भवात् । असाधारणतद्धेतुकधीत्वमिति चेन्न । आत्मप्रत्यभिज्ञानेऽप्यापत्तेः, आत्म- मनोयोगस्य साधारण्यात् । निर्वचन—'स्वविषय के नियम में समानविषयक ज्ञान की अपेक्षा रखनेवाले ज्ञान' को स्मृति कहेंगे। खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'तद् एव इदम्' इस प्रत्यभिज्ञा में तत्तांश में अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि प्रत्यभिज्ञा भी तत्तांश में समानविषयक अनुभव की अपेक्षा करती है । यदि प्रत्यभिज्ञा को तत्तांश में स्मृति मान लें, तो पूर्वदोष की ही आवृत्ति हो जायगी, अर्थात् 'प्रत्यभिज्ञा को 'तत्ता'-अंश में स्मृति और 'इदम्' अंश में अनुभवरूप भिन्न-भिन्न विषयक मान लेने पर उन दोनों का अभेद रूप अंश किससे गृहीत होगा ? निर्वचन—केवल संस्कारजन्य ज्ञान को ही स्मृति कहेंगे । खंडन—सभी कार्य कारणसामग्री से ही उत्पन्न होते हैं, कोई भी कार्य एक कारण से उत्पन्न नहीं होता । अतः स्मृति भी केवल संस्कार से जन्य न होने से उक्त लक्षण में असम्भव हो जायगा । स्मृति में भी आत्म-मनोयोग आदि अनेक कारण हुआ ही करते हैं । निर्वचन—'संस्कार है असाधारण कारण जिसका, वह ज्ञान स्मृति है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'सोऽहम्' इस आत्मविषयक प्रत्यभिज्ञा का भी संस्कार ही असाधारण कारण है, अतः प्रत्यभिज्ञा में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । आत्म-मनःसंयोग ज्ञानमात्र के प्रति कारण होने से वह प्रत्यभिज्ञा का असाधारण कारण नहीं हो सकता । यदि कहें कि संस्कार भी स्मृति का कारण होने से प्रत्यभिज्ञा का असाधारण कारण नहीं है, तो हम भी कह सकेंगे कि संस्कार प्रत्यभिज्ञा का कारण होने से स्मृति का भी असाधारण कारण नहीं है । फलतः लक्षण में असम्भव दोष हो जायगा ।