खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
Page 165 of 610
Read in context:४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम परार्थानुमानाभासे हि प्रतिपादितपदार्थसंसर्गारोपकारणसम्भवात्; तथापि तत्र तादात्म्यारोपकल्पने च तथाभ्रमनियमस्य निष्प्रमाणकत्वात् । कस्यचित्तत्र जातसंवादजातिसंसर्गभ्रमस्य मितौ का गतिः, का वा गतिः सिद्धसाधने ? तत्राप्यन्यत्वकल्पनायां सिद्धत्वव्याघातात् । तथात्वे च हेत्वाभास- स्यापि यथार्थग्राहितया उक्तनिमित्तस्य व्यभिचारेणाप्यन्यत्राभासे अन्यप्रतिभास- कल्पनाया निर्मिमित्तत्वात्; सिद्धसाधनमितेरेव वा व्यवच्छेदात् । याथार्थ्य-खण्डनम् यथार्थानुभवः प्रमेत्यप्यलक्षणम् । यथार्थत्वं हि तत्त्वविषयत्वं वा अर्थसदृशत्वं उक्त अंश में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च--उक्त स्थल में जब कि वह सामग्री गौ में गोत्व-समवायरूप सम्बन्ध के आरोप का कारण है, तो तादात्म्य का आरोप कैसे होगा ? कथञ्चित् स्वार्थानुमान-स्थल में 'तादात्म्यारोप की सामग्री है' ऐसा मान भी लें, तो भी परार्थानुमितिस्थल में 'अयं गौः' इस प्रतिज्ञावाक्य से धर्मी तथा धर्म की उपस्थितिरूप संसर्गारोप की सामग्री होने पर वहाँ तादात्म्य का आरोप करें, तो 'कहीं तादात्म्य का आरोप होता है, कहीं संसर्ग का' यह नियम ही निष्प्रमाण हो जायगा । किञ्च-किसी मनुष्य को संसर्गारोप में 'गवि गोत्वसंसर्गमनुमिनोमि' इस अनुव्य- वसाय से जहाँ संवाद-यथार्थत्व का निश्चय हुआ हो, वहाँ क्या गति होगी ? अर्थात् वहाँ तादात्म्यारोप है, यह नहीं कह सकते । किञ्च-सिद्धसाधनस्थल में यथार्थ ही अनुमिति होती है, अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि सिद्धसाधनस्थल में अन्य ही साध्य भासता है, अतः उक्त स्थल में ज्ञान के अयथार्थ होने से अतिव्याप्ति नहीं है, तो असिद्ध होने से उसका साधन हो ही सकता है यह सिद्ध साधनस्थल है इस कथन में व्याघात हो जायगा। यदि उक्त स्थल में ज्ञान के यथार्थ होने से उसको प्रमालक्षण का लक्ष्य ही मान लें, तो सिद्धसाधन के तुल्य अन्य हेत्वाभास से भी प्रमारूप ज्ञान ही उत्पन्न होंगे । फिर धूलिपटल में धूमभ्रम के अनन्तर जात अनुमिति में जो आप अन्य अग्नि का भान मानते हैं, वह निमित्तरहित हो जायगा । यदि कथञ्चित् धूलिपटल में धूमिभ्रम- स्थल में अन्य वह्नि का भान मान लें, तो भी सिद्धसाधनस्थल में ज्ञान के यथार्थ होने से अतिव्याप्ति अवश्य हो जायगी । याथार्थ्य का खण्डन खण्डन-'यथार्थ अनुभव प्रमा है' प्रमा का यह लक्षण भी दोषरहित नहीं है।