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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] अविसंवादित्व का खण्डन १६३ स्वरूपस्येतरव्यावृत्तस्य अद्याप्यप्रतीतेः कुतो व्यवच्छेदः प्रत्येत्तव्य इति व्यवच्छिन्नतज्ज्ञानमन्तरेण व्यवच्छिन्नतज्ज्ञानमशक्यमिति आत्माश्रयान्योन्याश्रयौ अनवस्था वा । एकोऽनेकविशेषेऽर्थे विशेषो यत्र लक्ष्यते । तद्विशेषान्तरान्यत्वाद् दोषस्तत्रैव धावति ॥ ३२ ॥ नापि तृतीयः ; व्याप्यशब्देन व्याप्यमात्रम्, तद्विशेषो वा कश्चिदभिप्रेतः स्यात् ? आद्ये सधूमाग्निविषयस्य स्वप्नज्ञानस्य अनाप्तवाक्यजबोधस्य वा नाप्र- मात्वं स्यात् । नापि द्वितीयः ; स ह्यर्थक्रिया वा, सामग्री वा ? उभयत्रापि पूर्वदोषानिवृत्तेः । प्रतीति अशक्य होने से आत्माश्रय होगा; इतरव्यावृत्त प्रमा के अधीन दुष्टत्व का ज्ञान और दुष्टत्वज्ञान के अधीन अदुष्ट-इन्द्रियजन्य ज्ञान से अबाधितरूप अविसंवादित्व के ज्ञान द्वारा प्रमा का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय होगा अथवा प्रमाज्ञान के अधीन दुष्टत्व का ज्ञान और दुष्टत्वज्ञान के अधीन अदुष्ट-इन्द्रियजन्य-ज्ञान, उससे अबाधितत्वरूप अविसंवादित्व का ज्ञान तथा उक्त अविसंवादित्व के ज्ञान के अधीन प्रमा का ज्ञान इस प्रकार चक्रक भी हो जायगा । यदि विपरीत पद से व्यवच्छेद्य प्रमा की और ही कुछ निरुक्ति करें, तो आत्माश्रय आदि तो न होगा, किन्तु उस प्रमा की निरुक्ति में भी अन्य प्रमा की अपेक्षा होगी और उसके लिए अन्य प्रमा की, इस तरह अनवस्था हो जायगी । इसी प्रकार जिस ज्ञान आदि पदार्थों के अनुभव, स्मरण आदि अनेक विशेष हैं और एक विशेष अन्य विशेष से अन्यत्वरूप से लक्षित होता है, अर्थात् अनुभव स्मरणान्यत्व से तथा स्मरण अनुभवान्यत्व से लक्षित होता है, वहाँ सर्वत्र आत्माश्रय आदि दोष होंगे । देखिये—अनुभव से अन्य ज्ञान स्मरण है और स्मरण से अन्य ज्ञान अनुभव । अतः स्मरण का निष्कृष्ट लक्षण हुआ—‘स्मरणान्यज्ञानान्यज्ञानत्वम्’ । इस लक्षण में स्मरण पद का प्रक्षेप होने से आत्माश्रय है । साथ ही स्मृति के लक्षण में अनुभव की और अनुभव के लक्षण में स्मृति की अपेक्षा होने से अन्योन्याश्रय भी है । ‘जिस ज्ञान के विषय का व्याप्य प्रतीयमान हो, वह ज्ञान अविसंवादी है’ यह तृतीय पक्ष भी उचित नहीं; कारण ‘व्याप्य’ शब्द से यदि व्याप्यमात्र का ग्रहण करें, तो सधूम वह्नि का स्वप्नज्ञान तथा अनाप्तवाक्य से जात ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । यदि ‘व्याप्य’ शब्द से व्याप्य-विशेष ( अर्थक्रिया या सामग्री ) का ग्रहण करें, तो भी धूम-सहित वह्नि के स्वप्नज ज्ञान में या अनाप्तवाक्य से जनित ज्ञान में ही अतिव्याप्ति हो जायगी ।