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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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१ परिच्छेद ] अबाधितत्त्वादि का खण्डन १६७ दोषाभावसहकृतस्य तथात्वे च अजायमानभ्रमसंशयप्रमादिव्यवहारे ज्ञानमात्राव- गमोदाहरणेऽपि तदापत्तेः । ज्ञातेनानेन लक्षणेन व्यवहारे च कथमिदमेव ज्ञातव्यमिति वक्तव्यम् । न तावत्प्रत्यक्षेण मानसेन ; तथा सति क्वचिज्ज्ञातायां प्रमायामप्रमाविपर्ययसंशया- नवकाशादि स्यात् । धर्मिवत् मनसैव निर्णीतत्वात् । चिह्नान्तरसापेक्षेणैव मनसा संवेदनचिह्नेनैव वा तेनैव लक्षणीभूय ज्ञापन- मित्यपि प्रत्याशामात्रम् । तच्चिह्नेनैव प्रमात्वजातिकल्पनाप्रतिच्छेदापत्तेः । प्रमा में अप्रमात्व का भ्रम या सन्देह नहीं होगा। अर्थात् जब ज्ञात लक्षण को 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का प्रयोजक मानें, तब तो कह सकते हैं कि प्रमात्वरूप लक्षण का ज्ञान न होने पर 'इयं प्रमा' यह व्यवहार नहीं होता; प्रमात्व का भ्रम या सन्देह ही होता है । किन्तु जब अज्ञात ( स्वरूपसत् ) ही लक्षण व्यवहार का प्रयोजक हो, तब तो प्रमा में सदा 'इयं प्रमा' यही व्यवहार होना चाहिए । समर्थन — दोषाभाव से सहित, स्वरूपसत् प्रमात्वरूप लक्षण 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का प्रयोजक है । अतः जहाँ दोष हो, वहाँ 'इयं प्रमा' यह व्यवहार नहीं होता; किन्तु भ्रम या सन्देह ही होता है । खंडन — जो ज्ञान वस्तुतः प्रमा है, किन्तु प्रमात्व- रूपसे ज्ञात नहीं है केवल ज्ञानत्वरूप से ही अवगत है और जिसमें भ्रम या सन्देह भी नहीं है, वहाँ 'इयं प्रमा' यह व्यवहार होना चाहिए, कारण दोषाभाव से सहित, स्वरूपसत् प्रमात्व वहाँ विद्यमान है । यदि ज्ञात लक्षण व्यवहार का प्रयोजक हो, तो लक्षण का ज्ञान कैसे हुआ, यह पूछना चाहिए । मानस प्रत्यक्ष से लक्षण का ज्ञान होता है, यह तो कह नहीं सकते, कारण कहीं-कहीं प्रमा होने पर भी प्रमात्व का जो सन्देह या भ्रम होता है, वह [ धर्मी- प्रमा के ज्ञान के तुल्य प्रमात्व का भी मानस प्रत्यक्ष हो जाने से ] नहीं होगा । समर्थन — अन्य चिह्न से युक्त मन से प्रमात्व का ज्ञान होता है अथवा चिह्न ही लिङ्गरूप से प्रमात्वरूप लक्षण की अनुमिति का हेतु है । अतः चिह्न रूप सहकारी के अज्ञान में अप्रमात्व का भ्रम हो सकता है । खण्डन — यदि ऐसा है, तो उसी चिह्न से 'इयं प्रमा' यह व्यवहार हो जायगा । फिर प्रमाण के अभाव से प्रमात्वजाति की सिद्धि ही न होगी ।