खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in context१७० . सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य. [ प्रथम एवं कर्मापि करणनिष्पादने चरितार्थम् । करणव्यापारो हि कर्मविषयो भवति, कर्माभावे विषयाभावात् करणव्यापार एव न निष्पद्यत इति तन्निर्वाहे तस्यापि चरितार्थत्वमिति । एवमधिकरणस्यापि करणव्यापारनिर्वाहकत्वम् । सम्प्रदानापादानयोश्च असार्वत्रिकत्वम् । करणं तु सार्वत्रिकमेवेति कारकान्तरेऽ- चरितार्थः सार्वत्रिको हेतुः करणमिति । मैवम् ; अस्तु तावदविचारितरमणीयमिदं व्याख्यानम् । अन्तरशब्दो यदि विशेषमात्रवचनस्तदा न व्यवच्छेदकः, न हि विशेषमपास्य कारकमात्रं केन- चिज्जन्यन्ते यद् व्यवच्छिद्येत । नापि चान्तरशब्दोऽन्यवचनः ; तथा सति 'कस्मादन्यदि'ति विशेषानिर्देशे इसी तरह कर्म भी करण के निष्पादन में चरितार्थ है। कारण करण का व्यापार कर्म में ही होता है, कर्म के अभाव में आश्रय का अभाव होने से करण का व्यापार नहीं हो सकता । अतः करण के निष्पादन में कर्म भी चरितार्थ है। इसी प्रकार अधिकरण भी करण के व्यापार का जनक है। क्योंकि करण का व्यापार किसी देश-कालरूप अधिकरण में ही होता है । सम्प्रदान प्रायः दानरूप क्रिया का और अपादान विभागरूप क्रिया का ही जनक होता है, अतः वे दोनों सार्वत्रिक नहीं हैं, जब कि करण क्रियामात्र का जनक होने से सार्वत्रिक है। अतः 'कारकान्तर में अचरितार्थ, सार्वत्रिक हेतुं करण है', यही करण का दोषरहित निर्वचन हो सकता है । खण्डन—'करण'-शब्दार्थ का यह व्याख्यान अविचारित-रमणीय है । अर्थात् विचार करके देखा जाय, तो कुछ भी नहीं है। कारण 'अनयोर्महदन्तरम्' की तरह यदि 'अन्तर' शब्द का 'विशेष' अर्थ करें, तो व्यवच्छेद्य न होने से उसका निवेश व्यर्थ हो जायगा । यदि कोई कारक-विशेष को छोड़कर कारक-सामान्य का जनक होता, तो कह सकते कि 'अन्तर शब्द को त्यागकर कारक में अचरितार्थ आदि लक्षण करने पर कारक-सामान्य के जनक का निषेध हो जायगा । वह न हो, अतः अन्तर शब्द का निवेश है।' किन्तु जब विशेष को त्यागकर सामान्य कारक का कोई जनक ही नहीं है, तो 'अन्तर' शब्द का निवेश व्यर्थ ही है। यदि अन्तर शब्द का 'अन्य' अर्थ करें, तो 'किससे अन्य' यह अपेक्षा होने पर समभिव्याहार से 'करण से अन्य' यही अर्थ होगा । जैसे 'अन्य